पकड़े गए आरोपियों की पहचान बिहार निवासी अशोक कुमार (65) और रंजन कुमार (47) के रूप में हुई है। जीआरपी पुलिस ने 3 सितंबर को दोनों को दबोचा था, जिन्हें देर रात तमिलनाडु की विरुधाचलम पुलिस अपने साथ ले गई।
जीआरपी पुलिस की शुरुआती जांच में आरोपियों की कार्यप्रणाली को लेकर चौकाने वाले खुलासे हुए हैं:
फर्जी पहचान का इस्तेमाल: आरोपी पहचान छिपाने के लिए ट्रेनों में फर्जी नाम और पते से रिजर्वेशन करवाते थे, ताकि चोरी के बाद पुलिस उन तक न पहुंच सके।
8 साल से सक्रिय: आरोपी नवंबर 2016 से लगातार ट्रेनों में चोरी की वारदातों को अंजाम दे रहे थे। हाल ही में जोधपुर में हुई एक बड़ी चोरी के बाद से ही पुलिस इनकी तलाश में जुटी हुई थी।
पूछताछ के दौरान आरोपियों ने स्वीकार किया कि उनका नेटवर्क देश के कई राज्यों में फैला हुआ था:
इन राज्यों में दी दबिश: आरोपियों ने राजस्थान (जोधपुर, मारवाड़ जंक्शन, आबूरोड) के अलावा बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, असम, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में दर्जनों वारदातों को अंजाम दिया।
तमिलनाडु बना मुख्य निशाना: आरोपियों ने सबसे ज्यादा चोरियां तमिलनाडु की लंबी दूरी की ट्रेनों में की थीं, जिसको लेकर वहां की पुलिस भी लगातार छापेमारी कर रही थी।
ट्रेनों में बढ़ती चोरी की घटनाओं को गंभीरता से लेते हुए रेलवे पुलिस ने विशेष रणनीति बनाई:
टीम का गठन: जीआरपी एसपी (जोधपुर) केवल राम और जीआरपी सीओ हरिराम सोनी के निर्देशन में जीआरपी थानाधिकारी मुक्ता पारीक के नेतृत्व में एक विशेष टीम गठित की गई।
संयुक्त कार्रवाई: जीआरपी तमिलनाडु की टीम आरोपियों की तलाश में यूपी, बिहार और अन्य राज्यों में दबिश दे रही थी। जोधपुर जीआरपी की सूचना पर दोनों पुलिस टीमों ने संयुक्त रूप से बिहार में छापेमारी कर आरोपियों को पकड़ा और 3 सितंबर को जोधपुर लेकर पहुंचीं।