मृतका की पहचान गोगुंदा क्षेत्र के कालोड़ा गोवर्धन निवासी लीला उर्फ नीलम (40) के रूप में हुई है। लीला अपने पति मदन गमेती के साथ उदयपुर के बेदला क्षेत्र में एक निर्माणाधीन मकान पर चौकीदारी का काम करती थी। बताया गया कि वह कई दिनों से बुखार से पीड़ित थी। धीरे-धीरे उसकी तबीयत बिगड़ती चली गई।
पुलिस के अनुसार, तबीयत ज्यादा खराब होने पर पति मदन गमेती अपनी पत्नी को 17 सितंबर को उदयपुर के एमबी अस्पताल लेकर पहुंचा। यहां चिकित्सकों ने महिला को भर्ती कर इलाज शुरू किया। हालांकि, इलाज के दौरान अगले ही दिन 18 सितंबर को लीला की मौत हो गई।
पत्नी की मौत के बाद पति के सामने ऐसी समस्या खड़ी हो गई, जिसके बारे में शायद उसने कभी सोचा भी नहीं होगा। पत्नी का शव अस्पताल के मुर्दाघर में रखवा दिया गया, लेकिन अंतिम संस्कार के लिए जरूरी खर्च जुटाना उसके लिए संभव नहीं था।
मदन गमेती ने पुलिस को अपनी आर्थिक स्थिति के बारे में बताया। उसने कहा कि वह पत्नी का अंतिम संस्कार कराने में सक्षम नहीं है। एक तरफ जीवनसाथी को खोने का गहरा दुख था, तो दूसरी तरफ अंतिम संस्कार की व्यवस्था करने के लिए पैसे नहीं थे।
आर्थिक तंगी के कारण शव को मुर्दाघर में ही रखा गया। इस दौरान पति अपनी पत्नी के अंतिम संस्कार के लिए मदद की उम्मीद में इधर-उधर प्रयास करता रहा। लेकिन हालात ऐसे थे कि वह अकेले इस जिम्मेदारी को पूरा नहीं कर पा रहा था।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे भावुक पहलू यह रहा कि महिला का मासूम बेटा भी पिता के साथ मौजूद था। जिस उम्र में बच्चे को मां की गोद और पिता के सहारे की जरूरत होती है, उसी उम्र में वह मां को खोने के बाद उसकी अंतिम विदाई का इंतजार करता रहा।
पिता-पुत्र अपनी आंखों के सामने लीला को अंतिम विदाई देना चाहते थे, लेकिन आर्थिक मजबूरी उनके सामने बड़ी दीवार बनकर खड़ी थी। पति ने अपनी परेशानी एसआई मनोहर सिंह को बताई। इसके बाद पुलिस ने महिला के अंतिम संस्कार की व्यवस्था के लिए प्रयास शुरू किए।
पुलिस को जब परिवार की आर्थिक स्थिति का पता चला तो मेवाड़ प्रताप संस्थान से संपर्क किया गया। संस्था ने अंतिम संस्कार के लिए सहयोग करने की सहमति दी। इसके बाद जरूरी प्रक्रिया पूरी कर महिला के शव को परिवार को सौंपने की व्यवस्था की गई।
पुलिस के अनुसार, शव का पोस्टमॉर्टम नहीं कराया गया और संस्था के सहयोग से अंतिम संस्कार की व्यवस्था की गई। इसके बाद लीला का शव मुर्दाघर से निकालकर अशोकनगर मोक्षधाम ले जाया गया।
करीब सात दिन तक मुर्दाघर में रहने के बाद लीला को आखिरकार अंतिम विदाई मिली। पति मदन गमेती और उसका बेटा अशोकनगर मोक्षधाम पहुंचे। यहीं परिवार की मौजूदगी में लीला का अंतिम संस्कार कराया गया।
जिस महिला के साथ मदन ने जीवन बिताया, उसकी अंतिम विदाई के समय भी उसके सामने आर्थिक तंगी की वही मजबूरी थी, जिसने सात दिनों तक पत्नी के शव को मुर्दाघर में रोके रखा। हालांकि, पुलिस और सामाजिक संस्था की मदद से आखिरकार परिवार को यह अवसर मिला कि वह अपनी पत्नी और मां को अंतिम विदाई दे सके।
यह घटना सिर्फ एक महिला की मौत और अंतिम संस्कार की कहानी नहीं है, बल्कि आर्थिक तंगी से जूझ रहे परिवारों की मजबूरियों की ओर भी इशारा करती है। बीमारी के इलाज से लेकर अंतिम संस्कार तक का खर्च कई गरीब परिवारों के लिए बड़ी चुनौती बन जाता है।
लीला की मौत के बाद उसके परिवार के पास अंतिम संस्कार तक के लिए पैसे नहीं थे। ऐसे में पुलिस और सामाजिक संस्था के सहयोग ने परिवार की मुश्किल घड़ी में सहारा दिया। सात दिन बाद जब शव मुर्दाघर से अंतिम सफर के लिए निकला, तब पति और बेटे ने नम आंखों से लीला को अंतिम विदाई दी।