महिला पहलवानों ने हाईकोर्ट में दाखिल चुनौती में ट्रायल कोर्ट के फैसले में दर्ज कुछ निष्कर्षों और टिप्पणियों पर सवाल उठाए हैं। याचिका में तर्क दिया गया है कि यौन उत्पीड़न के मामलों में शिकायतकर्ता के व्यवहार को किसी तय सामाजिक धारणा या अपेक्षित पैटर्न के आधार पर नहीं परखा जा सकता।
याचिका में ट्रायल कोर्ट के दृष्टिकोण को ‘archaic’ यानी पुरानी सोच पर आधारित बताया गया है। पहलवानों का कहना है कि किसी यौन हिंसा की घटना के बाद पीड़िता किस तरह व्यवहार करेगी, इसका कोई एक निश्चित तरीका नहीं हो सकता।
याचिका के मुताबिक, प्रत्येक व्यक्ति की परिस्थितियां अलग होती हैं और घटना के बाद उसकी प्रतिक्रिया भी अलग-अलग हो सकती है। इसलिए केवल इस आधार पर किसी शिकायतकर्ता के बयान या आरोप की विश्वसनीयता पर सवाल उठाना उचित नहीं है कि उसने कथित घटना के बाद आरोपी के साथ किस तरह का व्यवहार किया।
राउज एवेन्यू कोर्ट ने बृजभूषण शरण सिंह को बरी करते हुए अभियोजन पक्ष की कहानी में बताई गई कुछ विसंगतियों को महत्वपूर्ण माना था। अदालत ने शिकायतकर्ताओं की ओर से बताए गए घटनास्थल और घटना के वर्ष से संबंधित विवरणों में अंतर का भी उल्लेख किया था।
फैसले में अदालत ने यह भी विचार किया था कि आरोप लगाए जाने के बावजूद शिकायतकर्ताओं और आरोपी के बीच कथित तौर पर लंबे समय तक सामान्य संबंध क्यों बने रहे। महिला पहलवानों ने अब हाईकोर्ट में इसी तरह के निष्कर्षों को चुनौती दी है और कहा है कि यौन उत्पीड़न के मामलों में पीड़िता के व्यवहार को लेकर पूर्व निर्धारित धारणाओं को निर्णायक आधार नहीं बनाया जाना चाहिए।
बृजभूषण शरण सिंह ने महिला पहलवानों की ओर से लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों से लगातार इनकार किया है। ट्रायल कोर्ट ने उन्हें बरी करने के साथ भारतीय कुश्ती महासंघ के तत्कालीन सहायक सचिव विनोद तोमर को भी मामले में आरोपों से बरी कर दिया था।
अब महिला पहलवानों की याचिका के जरिए दिल्ली हाईकोर्ट से ट्रायल कोर्ट के फैसले की न्यायिक समीक्षा की मांग की गई है। हाईकोर्ट में आगे की सुनवाई के दौरान यह देखा जाएगा कि याचिका में उठाए गए कानूनी और तथ्यात्मक सवालों पर अदालत किस तरह विचार करती है।