गहलोत ने लिखा कि जनता को इस पूरे घटनाक्रम की ‘क्रोनोलॉजी’ समझनी चाहिए। उन्होंने जून 2025 में वित्त मंत्रालय की ओर से UPI पर MDR लगाए जाने की खबरों को गलत और भ्रामक बताए जाने का हवाला दिया। इसके बाद मार्च 2026 में अमेरिकी संस्था USTR की रिपोर्ट का जिक्र करते हुए गहलोत ने कहा कि रिपोर्ट में भारत की UPI नीति को अमेरिकी भुगतान कंपनियों के लिए नुकसानदायक बताया गया था।
अब सितंबर 2026 में नए MDR ढांचे के तहत 2,000 रुपये से अधिक के कुछ मर्चेंट UPI लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत MDR लागू करने का फैसला किया गया है। यह व्यवस्था 15 अक्टूबर 2026 से लागू होगी।
केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि नया MDR उपभोक्ताओं से सीधे वसूला जाने वाला शुल्क नहीं है। व्यक्ति से व्यक्ति यानी P2P UPI भुगतान किसी भी राशि पर मुफ्त रहेगा। 2,000 रुपये तक के मर्चेंट भुगतान भी मुफ्त रहेंगे और सरकार के मुताबिक करीब 96 प्रतिशत P2M लेनदेन नए MDR से प्रभावित नहीं होंगे।
2,000 रुपये से अधिक के निर्दिष्ट मर्चेंट लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत MDR तय किया गया है, जिसकी अधिकतम सीमा 300 रुपये प्रति लेनदेन होगी। सरकार का कहना है कि MDR से मिलने वाली राशि भुगतान व्यवस्था से जुड़े बैंकों और सेवा प्रदाताओं के बीच वितरित होगी तथा UPI के संचालन, सुरक्षा और विस्तार में मदद करेगी।
अशोक गहलोत ने अपने पोस्ट में दावा किया कि इस फैसले से वीजा और मास्टरकार्ड जैसी अमेरिकी कंपनियों को फायदा होगा, जबकि इसका असर भारत के आम लोगों और छोटे व्यापारियों पर पड़ेगा। उन्होंने इसी संदर्भ में सवाल उठाया- ‘फायदा अमेरिका का और नुकसान भारत की जनता का, यह कैसा आत्मनिर्भर भारत है?’
हालांकि, केंद्र सरकार ने अमेरिकी दबाव की बात को स्वीकार नहीं किया है। सरकार के अनुसार MDR व्यवस्था UPI इकोसिस्टम को लंबे समय तक टिकाऊ बनाए रखने और उसकी सुरक्षा व बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के उद्देश्य से लागू की गई है।
इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी के बीच UPI के नए शुल्क ढांचे को लेकर बहस तेज हो गई है। सरकार ने फिलहाल इस व्यवस्था को वापस लेने की संभावना से भी इनकार किया है।