आंकड़ों के मुताबिक, 15 सितंबर से 12 अक्टूबर के बीच सात राज्यों में धान की पराली जलाने की कुल 654 घटनाएं दर्ज की गईं। राजस्थान में इस अवधि के दौरान 60 घटनाएं सामने आईं, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह संख्या 20 थी। वहीं, मध्यप्रदेश में घटनाएं 61 से बढ़कर 337 हो गईं।
राजस्थान में पराली जलाने की घटनाओं के मामले में हाड़ौती क्षेत्र के बारां, कोटा और बूंदी जिले प्रमुखता से सामने आए हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, बारां में पराली जलाने की 33, कोटा में 10 और बूंदी में पांच घटनाएं दर्ज की गईं। इन तीन जिलों में कुल 48 घटनाएं हुईं, जो प्रदेश में दर्ज 60 घटनाओं का लगभग 80 फीसदी हिस्सा है।
इन आंकड़ों से संकेत मिलता है कि प्रदेश में पराली जलाने की समस्या कुछ क्षेत्रों में अधिक केंद्रित है। कृषि अवशेषों के निस्तारण के लिए उचित व्यवस्था और किसानों को वैकल्पिक तरीकों की जानकारी देना प्रदूषण नियंत्रण के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकता है।
मध्यप्रदेश में पराली जलाने की घटनाओं में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी दर्ज की गई है। पिछले साल 15 सितंबर से 12 अक्टूबर के बीच यहां 61 घटनाएं सामने आई थीं, जबकि इस साल इनकी संख्या बढ़कर 337 हो गई।
जिलावार आंकड़ों में गुना में सबसे ज्यादा 45 घटनाएं दर्ज की गईं। इसके अलावा सीहोर में 35, उज्जैन में 33 और इंदौर में 20 घटनाएं सामने आईं। मध्यप्रदेश के कई शहरों में भी वायु गुणवत्ता को लेकर चिंता बढ़ रही है।
इसके विपरीत, उत्तर प्रदेश में पराली जलाने की घटनाएं 180 से घटकर 123 रह गईं। हरियाणा में भी पिछले साल की इसी अवधि के 15 मामलों के मुकाबले इस साल सात घटनाएं दर्ज हुईं। अन्य राज्यों में कुल 123 घटनाएं सामने आईं, जबकि पिछले साल यह संख्या 126 थी।
शहरों में वायु प्रदूषण का कारण केवल पराली का धुआं नहीं है। वाहनों की बढ़ती संख्या, डीजल वाहनों से निकलने वाला धुआं, निर्माण स्थलों की धूल, सड़कों पर जमा धूल और औद्योगिक गतिविधियां भी हवा की गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं।
दिल्ली, जयपुर, इंदौर, भोपाल, कोटा और रायपुर जैसे शहरों में प्रदूषण के कई स्रोत एक साथ सक्रिय रहते हैं। ऐसे में पराली जलाने से निकलने वाला धुआं क्षेत्रीय स्तर पर प्रदूषण की समस्या को और गंभीर बना सकता है।
सर्दियों के दौरान हवा की रफ्तार कम होने से प्रदूषक कण वातावरण में लंबे समय तक बने रह सकते हैं। इससे प्रदूषण का असर बढ़ने की आशंका रहती है। राजस्थान के जयपुर, बीकानेर, कोटा, बूंदी और चित्तौड़गढ़ सहित कई शहरों में वायु गुणवत्ता पर नजर रखना जरूरी हो गया है।
दिए गए वायु गुणवत्ता आंकड़ों में राजस्थान के बीकानेर और चित्तौड़गढ़ भी शामिल हैं। सूची के अनुसार, बीकानेर का वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 204 दर्ज किया गया, जो खराब श्रेणी में है। वहीं, चित्तौड़गढ़ का AQI 177 रहा, जिसे मध्यम श्रेणी में रखा गया है।
सूची में उत्तर प्रदेश के खोरा और बड़ौत का AQI 240, ग्रेटर नोएडा का 224, बिहार के समस्तीपुर का 215 और गाजियाबाद का 208 दर्ज किया गया। नोएडा का AQI 201 रहा। वहीं, बल्लभगढ़ का 180 और मुजफ्फरनगर का 179 दर्ज किया गया, जो मध्यम श्रेणी में आते हैं।
AQI के ये आंकड़े संबंधित समय के वायु गुणवत्ता स्तर को दर्शाते हैं। प्रदूषण की स्थिति समय और स्थान के अनुसार बदल सकती है।
पराली जलाने की घटनाओं में बढ़ोतरी और सर्दियों में प्रदूषकों के जमा होने की आशंका को देखते हुए प्रदूषण नियंत्रण के लिए समय रहते कदम उठाना जरूरी है। कृषि अवशेषों का वैकल्पिक निस्तारण, निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण, सड़कों की नियमित सफाई और वाहनों से होने वाले उत्सर्जन पर निगरानी जैसे उपाय मददगार हो सकते हैं।
राजस्थान में खास तौर पर बारां, कोटा और बूंदी जैसे जिलों में पराली जलाने की घटनाओं पर रोक लगाने के लिए स्थानीय स्तर पर प्रयास महत्वपूर्ण होंगे। वहीं, शहरों में वायु गुणवत्ता की नियमित निगरानी और प्रदूषण के अलग-अलग स्रोतों पर नियंत्रण से सर्दियों में हवा को अधिक प्रदूषित होने से रोकने में मदद मिल सकती है।