नामांकन के बाद अब दोनों प्रमुख दलों की नजर पार्षदों के समर्थन पर है। निर्दलीय पार्षदों की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। ऐसे में मेयर चुनाव में संख्या बल के साथ-साथ अंतिम समय की रणनीति पर भी निगाहें रहेंगी।
भाजपा ने वार्ड 7 की पार्षद सुमनलता अग्रवाल को मेयर पद के लिए प्रत्याशी बनाया है। सुमनलता अग्रवाल पूर्व नगर परिषद सभापति अजय अग्रवाल की पत्नी हैं। मेयर पद के लिए नामांकन दाखिल करने से पहले उन्होंने पार्षद पद की शपथ ली।
नामांकन के दौरान वन राज्य मंत्री एवं अलवर शहर विधायक संजय शर्मा, भाजपा जिला अध्यक्ष अशोक गुप्ता, चुनाव प्रभारी रामचरण बोहरा सहित पार्टी के कई नेता और कार्यकर्ता मौजूद रहे। भाजपा की ओर से नामांकन के दौरान पार्टी की एकजुटता दिखाने की कोशिश की गई।
मेयर पद के चुनाव में भाजपा के सामने अपने पार्षदों को एकजुट रखने के साथ-साथ निर्दलीय पार्षदों का समर्थन बनाए रखने की चुनौती होगी। पार्टी नेताओं की ओर से लगातार पार्षदों से संपर्क और चुनावी रणनीति पर चर्चा की जा रही है।
कांग्रेस ने वार्ड 39 से निर्वाचित पार्षद कमलेश शर्मा को मेयर पद के लिए प्रत्याशी बनाया है। कमलेश शर्मा पूर्व जिला कांग्रेस अध्यक्ष योगेश मिश्रा की पत्नी हैं।
नामांकन दाखिल करने के दौरान कांग्रेस के निर्वाचित पार्षद, पार्टी कार्यकर्ता और जिला अध्यक्ष प्रकाश गंगावत सहित अन्य नेता मौजूद रहे। कांग्रेस की कोशिश अपने पार्षदों को एकजुट रखने और निर्दलीय पार्षदों का समर्थन हासिल करने की होगी।
मेयर चुनाव में कांग्रेस के लिए संख्या बल के अलावा क्रॉस वोटिंग की आशंका भी महत्वपूर्ण मुद्दा हो सकती है। पार्टी नेतृत्व पार्षदों के बीच समन्वय बनाए रखने के लिए लगातार रणनीति तैयार कर रहा है।
वार्ड 36 से कांग्रेस के टिकट पर पार्षद का चुनाव लड़ चुकीं रिंकल गर्ग ने मेयर पद के लिए निर्दलीय नामांकन दाखिल किया है। उनके मैदान में उतरने से मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा नहीं रह गया है।
रिंकल गर्ग ने नामांकन पत्र जमा कर मेयर पद के चुनाव में अपनी दावेदारी पेश की है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि उन्हें कितने पार्षदों का समर्थन मिलता है। उनके निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव मैदान में आने से दोनों प्रमुख दलों की रणनीति भी प्रभावित हो सकती है।
अलवर के पिछले नगर निकाय चुनाव का रिकॉर्ड भी इस बार के मेयर चुनाव को लेकर चर्चा में है। वर्ष 2019 में भाजपा के पास 27 सीटें थीं, जबकि कांग्रेस के पास 19 सीटें थीं। इसके बावजूद कांग्रेस अपना सभापति बनाने में सफल रही थी। उस चुन