स्थिति यह है कि ग्राहक 200 या 500 रुपए का नोट लेकर 20 या 30 रुपए का सामान खरीदने दुकान पर पहुंचता है, तो सामान देने से पहले दुकानदार का सवाल होता है- ‘छुट्टे हैं क्या?’ कई बार ग्राहक के पास भी छोटे नोट नहीं होते और दुकानदार के पास भी बड़े नोट का छुट्टा देने के लिए पर्याप्त रकम नहीं होती। ऐसे में छोटी-सी खरीदारी भी लेन-देन की माथापच्ची में बदल जाती है।
छोटे दुकानदारों के लिए सबसे बड़ी समस्या 10, 20 और 50 रुपए के नोटों के साथ-साथ सिक्कों की उपलब्धता को लेकर है। किराना दुकानों, सब्जी विक्रेताओं, ठेले-पटरी वालों और रोजमर्रा की छोटी खरीदारी करने वाले ग्राहकों के बीच छोटे मूल्यवर्ग की नकदी की जरूरत सबसे ज्यादा रहती है।
व्यापारियों का कहना है कि एक ग्राहक यदि 25 रुपए का सामान खरीदता है और 500 रुपए का नोट देता है, तो कई बार पूरा लेन-देन रोककर दूसरे ग्राहकों से छुट्टे पैसे जुटाने पड़ते हैं। कुछ मामलों में ग्राहक को सामान कम करना पड़ता है या फिर दूसरे दुकानदार से छुट्टे कराने के लिए जाना पड़ता है।
त्योहारी सीजन को देखते हुए व्यापारियों की चिंता इसलिए भी बढ़ गई है, क्योंकि आने वाले दिनों में बाजारों में खरीदारी बढ़ने की संभावना है। छोटी-बड़ी खरीदारी के साथ नकद लेन-देन बढ़ेगा तो छोटे नोटों और सिक्कों की मांग भी बढ़ेगी।
भले ही पिछले कुछ वर्षों में डिजिटल भुगतान का चलन तेजी से बढ़ा है, लेकिन निम्बाहेड़ा जैसे स्थानीय बाजारों में नकदी की जरूरत अभी भी बनी हुई है। हर ग्राहक डिजिटल भुगतान नहीं कर सकता। बुजुर्ग, छोटे बच्चे, ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले खरीदार और कई ऐसे लोग हैं, जो रोजमर्रा की छोटी खरीदारी के लिए नकदी का इस्तेमाल करते हैं।
ठेले और रेहड़ी-पटरी पर सामान बेचने वाले कई छोटे कारोबारियों के लिए भी नकदी अभी महत्वपूर्ण माध्यम है। ग्राहक के पास यूपीआई की सुविधा होने के बावजूद कई बार नेटवर्क, मोबाइल या तकनीकी समस्या के कारण डिजिटल भुगतान नहीं हो पाता। ऐसे समय में नकद भुगतान ही सबसे आसान विकल्प रह जाता है।
स्थानीय बाजारों में छोटे नोटों की कमी के बीच डिजिटल भुगतान को लेकर चल रही अलग-अलग चर्चाओं और भ्रम का भी असर देखने को मिल रहा है। यूपीआई लेन-देन पर संभावित शुल्क जैसी चर्चाओं ने कई लोगों को नकदी अपने पास रखने के लिए प्रेरित किया है। हालांकि यूपीआई से जुड़े नियमों और शुल्क को लेकर अलग-अलग तरह की जानकारी सामने आने से लोगों के बीच भ्रम की स्थिति भी बनी रहती है।
कुछ ग्राहक छोटे नोट और सिक्के खर्च करने के बजाय उन्हें अपने पास सुरक्षित रखना पसंद कर रहे हैं। इसका सीधा असर बाजार में उपलब्ध छोटी नकदी पर पड़ रहा है।
छोटे नोटों और सिक्कों की कमी से निपटने के लिए स्थानीय व्यापारियों ने फिलहाल अपना जुगाड़ शुरू कर दिया है। एक दुकानदार दूसरे दुकानदार से बड़े नोट देकर छोटे नोट और सिक्के ले रहा है। कई व्यापारी दिनभर की बिक्री के बाद जमा हुई छोटी नकदी को जरूरतमंद दूसरे व्यापारियों के साथ बदल रहे हैं।
इस व्यवस्था से फिलहाल काम चल रहा है, लेकिन व्यापारी इसे स्थायी समाधान नहीं मानते। उनका कहना है कि यदि त्योहारों के दौरान ग्राहकों की संख्या बढ़ी तो मौजूदा छोटी नकदी पर्याप्त नहीं होगी।
नवरात्र और दीपावली के दौरान कपड़े, पूजा सामग्री, मिठाई, फल-सब्जी, किराना और अन्य रोजमर्रा की वस्तुओं की खरीदारी बढ़ जाती है। इनमें बड़ी संख्या में छोटी रकम के लेन-देन होते हैं। ऐसे में छोटे नोटों और सिक्कों की मांग सामान्य दिनों की तुलना में काफी बढ़ सकती है।
व्यापारियों को आशंका है कि यदि समय रहते बैंकों और संबंधित स्तर पर छोटे मूल्यवर्ग की नकदी की उपलब्धता नहीं बढ़ाई गई तो आने वाले दिनों में परेशानी और बढ़ सकती है।
फिलहाल निम्बाहेड़ा के बाजारों में डिजिटल भुगतान और आपसी जुगाड़ के सहारे काम चल रहा है, लेकिन छोटी नकदी की जरूरत खत्म नहीं हुई है। आने वाले त्योहारी दिनों में बाजार में खरीदारी बढ़ने के साथ यह समस्या कितनी गंभीर होती है, यह देखने वाली बात होगी। फिलहाल दुकानदारों के बीच एक सवाल सबसे ज्यादा सुनाई दे रहा है—‘भाई साहब, छुट्टे हैं क्या?’