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जयपुर में अरण्य भवन के पास पिंजरे में फंसी मादा लेपर्ड, आमागढ़ के जंगल में सुरक्षित छोड़ा

मादा लेपर्ड की लगातार बढ़ती गतिविधियों को देखते हुए हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स (HoFF) अरिजीत बनर्जी ने मामले को गंभीरता से लिया और उसे पकड़ने के लिए तत्काल पिंजरा लगाने के निर्देश दिए। इसके बाद एसीएफ जितेंद्र सिंह शेखावत की निगरानी में वन विभाग की टीम ने अरण्य भवन के पास एक रणनीतिक स्थान पर पिंजरा लगाया।

वन विभाग की टीम ने पिंजरे में शिकार रखा। देर रात मादा लेपर्ड शिकार के लालच में पिंजरे के अंदर पहुंच गई और उसे सुरक्षित तरीके से ट्रैप कर लिया गया। लेपर्ड के पकड़े जाने के बाद वन विभाग की टीम ने राहत की सांस ली।

स्वास्थ्य जांच के बाद आमागढ़ में रिलीज

सुबह रेस्क्यू टीम मौके पर पहुंची और पिंजरे में मौजूद मादा लेपर्ड का प्राथमिक स्वास्थ्य परीक्षण किया। जांच में उसके स्वस्थ पाए जाने के बाद उसे विशेष रेस्क्यू वाहन से आमागढ़ के जंगल ले जाया गया।

वन विभाग के अधिकारियों और वाइल्डलाइफ टीम की मौजूदगी में मादा लेपर्ड को आमागढ़ के जंगल में सुरक्षित रूप से खुले क्षेत्र में रिलीज किया गया। इसके बाद टीम ने उसकी गतिविधियों पर नजर रखने की व्यवस्था भी की।

झालाना में लेपर्ड की मॉनिटरिंग पर सवाल

मादा लेपर्ड के सुरक्षित रेस्क्यू के बाद एक बार फिर झालाना क्षेत्र में वन्यजीवों की मॉनिटरिंग और ट्रैकिंग व्यवस्था को लेकर सवाल उठ रहे हैं। क्षेत्र के आसपास करीब 20 से 25 लेपर्ड होने की बात सामने आती रही है। वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, यदि लेपर्ड की संख्या और उनका क्षेत्रीय फैलाव लगातार बढ़ता है तो रिहायशी इलाकों में उनकी आवाजाही की घटनाएं भी बढ़ सकती हैं।

इससे पहले झालाना के चर्चित मेल लेपर्ड 'संग्राम' को भी रेस्क्यू कर आमागढ़ क्षेत्र में छोड़ा गया था। बाद में उसकी मौत हो गई थी। इस घटना के बाद वन्यजीवों के रेस्क्यू, शिफ्टिंग और रिलीज के बाद उनकी मॉनिटरिंग को लेकर भी चर्चा हुई थी।

वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि लेपर्ड के रिहायशी क्षेत्रों की ओर आने के पीछे कई कारण हो सकते हैं। ऐसे में केवल रेस्क्यू और दूसरी जगह रिलीज करने के बजाय उनके आवास क्षेत्र, भोजन, मूवमेंट और ट्रैकिंग की लगातार निगरानी जरूरी है।