'बेटा, मैं तुझसे बहुत प्यार करता हूं। तू मन लगाकर मैच खेलना। मैं हॉस्पिटल से तेरे लिए प्रार्थना करता रहूंगा।'
आज भले ही क्रिकेटर रिंकू सिंह के पिता उनके बीच न हों, मगर उनके ये शब्द सबके जेहन में गूंज रहे हैं। पिता खानचंद ने ये शब्द उस समय कहे थे, जब रिंकू नोएडा के यथार्थ हॉस्पिटल से वापस क्रिकेट के मैदान पर जाने की तैयारी कर रहे थे।
बीमार पिता को जब ये पता चला, तब वो भावुक हो गए। परिवार के लोग कहते हैं- वो दर्द में थे, बावजूद इसके बोले- मैं हॉस्पिटल से ही तेरे लिए दुआ करता रहूंगा, चिंता मत करना।
फोर्थ स्टेज लिवर कैंसर से जूझ रहे खानचंद ने 27 फरवरी की सुबह 4.36 बजे आखिरी सांस ली, वो 60 साल के थे। 23 फरवरी को तबीयत खराब होने के बाद उन्हें हॉस्पिटल में एडमिट कराया गया था।
रिंकू सिंह 24 फरवरी को चेन्नई से फ्लाइट लेकर हॉस्पिटल पहुंच गए थे। उन्हें टी-20 विश्वकप का प्रैक्टिस सेशन छोड़ना पड़ा था। करीब 6 घंटे वह पिता के पास हॉस्पिटल में रहे। इसके बाद वह चेन्नई वापस जाने लगे। उन्होंने पिता को बताया कि 26 फरवरी को जिम्बाब्वे के खिलाफ मैच है, मुझे देश के लिए खेलना होगा।
तब पिता ने रिंकू सिंह के सिर पर हाथ फेरते हुए आशीर्वाद किया कि तुम एक दिन बुलंदियों को छूना। खुद को कभी अकेला मत समझना…। तेरे जैसा बेटा हर बाप को मिले।
रिंकू सिंह की सफलता के पीछे उनके पिता का कड़ा संघर्ष छिपा है। खानचंद अलीगढ़ में एक गैस एजेंसी पर हॉकर का काम करते थे। अपने 5 बेटों और बेटी की अच्छी परवरिश के लिए उन्होंने कई साल घर-घर सिलेंडर पहुंचाए।
पहले वह साइकिल पर डिलीवरी करते थे, फिर लोगों के घरों में टेंपो से सिलेंडर पहुंचाने लगे। रिंकू बचपन में पिता को इस तरह मेहनत को देखकर परेशान हो जाते थे।
उन्होंने वादा किया था कि पापा…एक दिन मैं आपका सहारा बनूंगा और आपको इस कड़ी मेहनत से निजात दिलाऊंगा। क्रिकेट में कामयाब होते ही रिंकू ने पापा से किया अपना वादा भी पूरा किया।
उनकी मां वीना देवी घर की जिम्मेदारियां संभालती हैं। रिंकू 5 भाई और एक बहन में चौथे नंबर पर हैं। बड़े भाई सोनू, मुकुल और शीलू हैं। जबकि बहन नेहा और भाई जीतू, रिंकू से छोटे हैं। उनका परिवार एक समय बुलंदशहर के दानगढ़ में रहता था। जो बाद में अलीगढ़ में शिफ्ट हो गया।