रिपोर्टों के मुताबिक यदि राजपाल यादव निर्धारित जुर्माना अदा नहीं करते हैं, तो उनकी सजा छह महीने तक बढ़ सकती है। हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद अभिनेता की कानूनी परेशानियां एक बार फिर सुर्खियों में आ गई हैं। यह मामला करीब 16 वर्ष पुराना है और इसकी शुरुआत वर्ष 2010 में एक फिल्म के निर्माण के लिए लिए गए कर्ज से हुई थी।
इस पूरे मामले की जड़ वर्ष 2010 में है, जब राजपाल यादव ने बतौर निर्देशक अपनी पहली फिल्म 'अता पता लापता' बनाने का निर्णय लिया। फिल्म के निर्माण के लिए उन्होंने मेसर्स मुरली प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड से लगभग 5 करोड़ रुपए का कर्ज लिया था। उस समय उम्मीद थी कि फिल्म बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन करेगी और उसकी कमाई से कर्ज का भुगतान कर दिया जाएगा।
हालांकि फिल्म रिलीज होने के बाद दर्शकों को प्रभावित नहीं कर सकी और बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप साबित हुई। फिल्म के असफल होने के बाद राजपाल यादव समय पर कर्ज नहीं चुका सके। इसके बाद लेनदार कंपनी और अभिनेता के बीच विवाद शुरू हुआ, जो बाद में कानूनी लड़ाई में बदल गया।
कर्ज चुकाने के लिए अभिनेता की ओर से जारी किए गए कुछ चेक बैंक में प्रस्तुत किए गए, लेकिन वे बाउंस हो गए। इसके बाद कंपनी ने परक्राम्य लिखत अधिनियम (Negotiable Instruments Act) की धारा 138 के तहत अदालत का रुख किया। चेक बाउंस के मामलों में यह धारा सबसे अधिक लागू की जाती है और दोष सिद्ध होने पर आरोपी को कारावास तथा जुर्माने का प्रावधान है।
शिकायत के बाद अदालत में लंबी सुनवाई चली। दोनों पक्षों की दलीलें सुनी गईं और कई वर्षों तक यह मामला अलग-अलग अदालतों में चलता रहा।
अप्रैल 2018 में दिल्ली की एक मजिस्ट्रेट अदालत ने राजपाल यादव और उनकी पत्नी राधा यादव को चेक बाउंस मामले में दोषी करार दिया। अदालत ने अभिनेता को छह महीने की सजा सुनाई थी। अदालत ने माना कि जारी किए गए चेक वैध भुगतान के लिए थे और उनका बाउंस होना कानून के दायरे में अपराध है।
इस फैसले के बाद अभिनेता ने राहत पाने के लिए उच्च अदालतों का दरवाजा खटखटाया।
साल 2019 की शुरुआत में सेशंस कोर्ट ने मजिस्ट्रेट कोर्ट के फैसले को सही ठहराया। अदालत ने कहा कि निचली अदालत के फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है। इसके बाद राजपाल यादव ने दिल्ली हाई कोर्ट में अपील दाखिल कर सजा पर रोक लगाने और राहत देने की मांग की।
जून 2024 में दिल्ली हाई कोर्ट ने अभिनेता को अंतरिम राहत देते हुए उनकी सजा पर अस्थायी रोक लगा दी थी। अदालत ने इस दौरान स्पष्ट किया था कि यदि राजपाल यादव बकाया राशि के भुगतान के लिए गंभीर प्रयास करते हैं तो उन्हें राहत मिल सकती है।
कोर्ट ने उन्हें करीब 9 करोड़ रुपए की बकाया राशि के भुगतान के संबंध में ठोस कदम उठाने का निर्देश दिया था। अदालत ने उम्मीद जताई थी कि अभिनेता अपने वादे के अनुरूप भुगतान करेंगे और मामले का समाधान निकालेंगे।
समय बीतने के बावजूद अदालत के समक्ष किए गए भुगतान संबंधी आश्वासन पूरे नहीं किए गए। हाई कोर्ट ने पाया कि अभिनेता कई अवसर मिलने के बावजूद राशि जमा कराने में विफल रहे। इसी आधार पर अदालत ने उनके रवैये पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि उनका आचरण संदेह पैदा करता है।
कोर्ट ने माना कि बार-बार दिए गए आश्वासन के बावजूद भुगतान नहीं करना न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान नहीं दर्शाता। इसी कारण अदालत ने राहत देने से इनकार करते हुए सजा लागू करने का आदेश दिया।
मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने इस वर्ष 2 फरवरी को राजपाल यादव को सरेंडर करने का आदेश दिया था। आदेश के पालन में अभिनेता ने 5 फरवरी को दिल्ली की तिहाड़ जेल में आत्मसमर्पण किया।
वे लगभग 12 दिनों तक जेल में रहे और 17 फरवरी तक न्यायिक हिरासत में रहे। इसके बाद कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ती रही। अब ताजा आदेश में अदालत ने एक बार फिर उनके खिलाफ सख्त रुख अपनाया है।
शुक्रवार को सुनाए गए फैसले में हाई कोर्ट ने राजपाल यादव को तीन महीने की जेल की सजा सुनाई। साथ ही 7.35 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाने का आदेश दिया। रिपोर्टों के अनुसार यदि यह जुर्माना निर्धारित समय सीमा में जमा नहीं किया जाता है तो उनकी सजा छह महीने तक बढ़ सकती है।
अदालत ने संबंधित अधिकारियों को आवश्यक कार्रवाई करते हुए अभिनेता को जेल भेजने का निर्देश भी दिया है।
किसी भी मामले में अदालत केवल अपराध ही नहीं, बल्कि आरोपी के आचरण और न्यायिक प्रक्रिया के प्रति उसके रवैये को भी महत्व देती है। इस मामले में हाई कोर्ट ने कहा कि राजपाल यादव ने बार-बार भुगतान का भरोसा दिया, लेकिन उस पर अमल नहीं किया। अदालत ने इसी आधार पर उनके व्यवहार को संदिग्ध माना और कहा कि राहत देने का कोई औचित्य नहीं बनता।
भारत में चेक बाउंस के मामलों की सुनवाई परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 की धारा 138 के तहत होती है। यदि किसी व्यक्ति द्वारा जारी किया गया चेक पर्याप्त धनराशि न होने या अन्य वैध कारणों से बाउंस हो जाता है और कानूनी नोटिस के बाद भी भुगतान नहीं किया जाता, तो इसे दंडनीय अपराध माना जाता है। दोष सिद्ध होने पर आरोपी को कारावास, जुर्माना या दोनों की सजा हो सकती है।
राजपाल यादव हिंदी सिनेमा के उन कलाकारों में गिने जाते हैं जिन्होंने अपनी अलग कॉमिक टाइमिंग और दमदार अभिनय से दर्शकों के बीच खास पहचान बनाई। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत छोटे किरदारों से की, लेकिन धीरे-धीरे वे बॉलीवुड के सबसे लोकप्रिय हास्य कलाकारों में शामिल हो गए।
वर्ष 2003 में आई हंगामा से उन्हें व्यापक पहचान मिली। इसके बाद गरम मसाला, चुप चुप के, फिर हेरा फेरी, भूल भुलैया, मालामाल वीकली, भागम भाग, ढोल और कई अन्य फिल्मों में उनके अभिनय को खूब सराहा गया। उनकी कॉमिक टाइमिंग ने उन्हें दर्शकों का पसंदीदा बना दिया।
निर्देशक प्रियदर्शन की फिल्मों में राजपाल यादव ने कई यादगार किरदार निभाए। दोनों ने लगभग 8 से 10 फिल्मों में साथ काम किया। इन फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर भी अच्छा प्रदर्शन किया और राजपाल यादव को कॉमेडी के बड़े कलाकारों की कतार में खड़ा कर दिया।
राजपाल यादव केवल हास्य अभिनेता ही नहीं रहे, बल्कि उन्होंने कई फिल्मों में गंभीर भूमिकाएं भी निभाईं। फिल्म 'मैं माधुरी दीक्षित बनना चाहती हूं' में उनके अभिनय को काफी सराहना मिली। इसी फिल्म के लिए उन्हें उत्तर प्रदेश सरकार का प्रतिष्ठित यश भारती सम्मान प्रदान किया गया, जो राज्य का सर्वोच्च सांस्कृतिक सम्मान माना जाता है।
राजपाल यादव को कई प्रतिष्ठित फिल्म पुरस्कारों में नामांकन मिला। उन्हें फिल्मफेयर और आईफा अवॉर्ड्स में बेस्ट कॉमिक एक्टर की श्रेणी में कई बार नॉमिनेट किया गया। हालांकि वे इन पुरस्कारों को जीत नहीं सके, लेकिन दर्शकों के बीच उनकी लोकप्रियता लगातार बनी रही।
पिछले कुछ वर्षों में कानूनी विवादों ने राजपाल यादव के फिल्मी करियर पर भी असर डाला है। हालांकि वे फिल्मों और वेब सीरीज में समय-समय पर नजर आते रहे हैं, लेकिन चेक बाउंस मामले की सुनवाई और अदालत के आदेश लगातार उनके लिए चुनौती बने रहे।
अब हाई कोर्ट के ताजा फैसले के बाद यह मामला एक बार फिर चर्चा का विषय बन गया है। यदि अभिनेता अदालत के निर्देशानुसार जुर्माना जमा करते हैं या आगे किसी उच्च न्यायालय से राहत प्राप्त करते हैं, तो मामले की दिशा बदल सकती है। फिलहाल अदालत के आदेश के अनुसार उन्हें सजा और जुर्माने दोनों का सामना करना होगा।