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ट्रंप ने रूस-ईरान प्रतिबंध कानून पर किए साइन, भारत पर 100% तक टैरिफ का रास्ता साफ

नई दिल्ली। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस और ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने वाले ‘Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026’ पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। इसके साथ ही यह कानून बन गया है। कानून के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले प्रमुख देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार मिल गया है। भारत और चीन इस प्रावधान के दायरे में आने वाले प्रमुख देश हैं।

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि भारत पर तत्काल 100 प्रतिशत टैरिफ लागू हो गया है। कानून राष्ट्रपति को ऐसा टैरिफ लगाने का अधिकार देता है और वास्तविक दर तथा इसे लागू करने का फैसला अमेरिकी प्रशासन करेगा।

हाउस में 262-159 वोट से पास हुआ था बिल

यह कानून 16 सितंबर को अमेरिकी प्रतिनिधि सभा यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में 262-159 वोट से पारित हुआ था। इससे पहले अमेरिकी सीनेट ने 7 अगस्त को इसे 86-11 वोट से मंजूरी दी थी। राष्ट्रपति ट्रंप ने 18 सितंबर को इस पर हस्ताक्षर कर इसे कानून का रूप दे दिया।

कानून का उद्देश्य रूस के ऊर्जा और रक्षा क्षेत्र पर आर्थिक दबाव बढ़ाना और रूसी तेल-गैस से होने वाली आय को सीमित करना है।

भारत पर 100% टैरिफ का खतरा क्यों?

भारत रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता है। इसी वजह से वह अमेरिकी कानून में रूसी ऊर्जा के प्रमुख खरीदारों के लिए बनाए गए टैरिफ प्रावधान के संभावित दायरे में है। कानून के तहत राष्ट्रपति को ऐसे देशों से आने वाले अमेरिकी आयात पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की शक्ति दी गई है।

अगर अमेरिका भारत पर अधिकतम दर वाला टैरिफ लागू करता है, तो इसका असर भारत से अमेरिका जाने वाले सामान की कीमत पर पड़ सकता है। भारतीय निर्यातकों के लिए अमेरिकी बाजार में लागत बढ़ने से टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग सामान, जेम्स-ज्वेलरी, लेदर और अन्य निर्यात क्षेत्रों पर असर की संभावना पर नजर रहेगी। हालांकि वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिकी प्रशासन टैरिफ की दर, उत्पादों और लागू होने की समयसीमा को किस तरह तय करता है।

रूस से तेल खरीदना जारी रखा तो क्या होगा?

भारत के सामने एक तरफ ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने का सवाल है, तो दूसरी तरफ अमेरिका के नए कानून से पैदा हुआ व्यापारिक जोखिम। यदि भारत रूस से तेल खरीदना जारी रखता है और अमेरिका कानून के तहत अतिरिक्त टैरिफ लगाता है, तो भारतीय निर्यात पर दबाव बढ़ सकता है।

अमेरिकी टैरिफ बढ़ने पर अमेरिका में भारतीय उत्पाद महंगे हो सकते हैं। इसका असर उन कंपनियों पर पड़ सकता है जिनकी अमेरिकी बाजार पर बड़ी निर्भरता है।

हालांकि, विशेषज्ञों के मुताबिक वास्तविक असर का आकलन अमेरिकी प्रशासन की ओर से टैरिफ लागू किए जाने के बाद ही किया जा सकेगा।

दूसरे देशों से महंगा तेल खरीदने की चुनौती

दूसरी तरफ अगर भारत रूसी कच्चे तेल पर अपनी निर्भरता कम करता है, तो उसे अन्य अंतरराष्ट्रीय स्रोतों से अधिक तेल खरीदना पड़ सकता है। इससे आयात लागत पर असर पड़ सकता है।

भारत पहले से ही इराक, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, अमेरिका, नाइजीरिया और अन्य देशों से कच्चा तेल खरीदता है। ऐसे में रूसी तेल की जगह दूसरे स्रोतों से खरीद बढ़ाना एक विकल्प हो सकता है, लेकिन इसका आर्थिक असर वैश्विक तेल कीमतों, उपलब्धता और आपूर्ति व्यवस्था पर निर्भर करेगा।

रूस के तेल और ‘शैडो फ्लीट’ पर भी कार्रवाई

नए कानून में रूस के ऊर्जा क्षेत्र के अलावा उसके रक्षा क्षेत्र और प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाले नेटवर्क पर भी कार्रवाई का प्रावधान है। रूस के उन टैंकरों को भी निशाना बनाया जा सकता है जिन्हें उसकी तेल आपूर्ति के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले ‘शैडो फ्लीट’ का हिस्सा माना जाता है।

कानून के तहत रूस के अधिकारियों, बैंकों, वित्तीय संस्थानों और अन्य संबंधित इकाइयों पर भी प्रतिबंधों का दायरा बढ़ाया गया है।

ईरान पर भी बढ़ा प्रतिबंधों का दबाव

इस कानून में ईरान से जुड़े प्रतिबंधों को भी आगे बढ़ाया गया है। ईरान के ऊर्जा और हथियार क्षेत्रों से संबंधित अमेरिकी प्रतिबंध व्यवस्था को जारी रखने का प्रावधान किया गया है।

इस तरह नया कानून सिर्फ रूस के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि ईरान के खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंध व्यवस्था को भी लंबी अवधि के लिए मजबूत करता है।

भारत की नजर अब अमेरिकी प्रशासन के अगले कदम पर

कानून बनने के बाद अब भारत के लिए सबसे अहम सवाल यह है कि अमेरिकी प्रशासन इस नई शक्ति का इस्तेमाल किस तरह करता है। फिलहाल भारत पर 100% टैरिफ लगाया नहीं गया है, बल्कि राष्ट्रपति को इसे लगाने का अधिकार मिला है।

इसलिए आने वाले समय में अमेरिकी प्रशासन की ओर से टैरिफ की दर, किन उत्पादों पर यह लागू होगा और इसकी प्रभावी तारीख को लेकर लिए जाने वाले फैसले महत्वपूर्ण होंगे। इसी के आधार पर भारत के व्यापार, निर्यात और ऊर्जा सुरक्षा पर वास्तविक असर का आकलन किया जा सकेगा।