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ECI में 14 आपत्तियों की रिपोर्ट से विवाद, कांग्रेस ने आयोग को घेरा

नई दिल्ली। चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों को लेकर सामने आई एक मीडिया रिपोर्ट के बाद देश की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चुनाव आयोग के दो चुनाव आयुक्तों ने पिछले कुछ महीनों के दौरान आयोग के कई फैसलों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को लेकर औपचारिक आपत्तियां दर्ज कराई थीं। रिपोर्ट सामने आने के बाद कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं, जबकि चुनाव आयोग से जुड़े अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision - SIR) सहित सभी महत्वपूर्ण निर्णय तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति और सर्वसम्मति से लिए गए हैं।

क्या है पूरा मामला?

एक मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले लगभग 10 महीनों के दौरान कम से कम 14 बार आयोग के कुछ निर्णयों, आदेशों और प्रक्रियाओं पर औपचारिक आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट के अनुसार ये आपत्तियां मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने, मतदाता पंजीकरण से जुड़े फॉर्म-6 में बदलाव, चुनावी डेटा प्रबंधन, मतदाता डेटाबेस की सुरक्षा तथा प्रशासनिक प्रक्रियाओं जैसे विषयों से जुड़ी थीं।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि कुछ मामलों में दोनों आयुक्तों ने यह सवाल उठाया कि कुछ फैसलों की जानकारी उन्हें समय पर नहीं दी गई या उनकी सहमति के बिना प्रक्रियाएं आगे बढ़ाई गईं। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।

राहुल गांधी का चुनाव आयोग पर हमला

रिपोर्ट सामने आने के बाद कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने चुनाव आयोग को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए कहा कि यदि मतदाता सूची और मतदान प्रक्रिया से जुड़ी व्यवस्थाओं में गड़बड़ी होती है तो यह लोकतंत्र और संविधान के लिए गंभीर विषय है। राहुल गांधी ने चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि वोट का अधिकार लोकतंत्र की बुनियाद है और इससे जुड़ी किसी भी अनियमितता की जांच होनी चाहिए।

राहुल गांधी ने एक वीडियो भी साझा किया, जिसमें उन्होंने चुनाव आयोग और उसके अधिकारियों को संबोधित करते हुए कहा कि चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए। कांग्रेस लगातार यह आरोप लगाती रही है कि मतदाता सूची पुनरीक्षण की कुछ प्रक्रियाओं में पात्र मतदाताओं के नाम प्रभावित हो सकते हैं। हालांकि चुनाव आयोग इन आरोपों को पहले भी खारिज करता रहा है।

मनीष तिवारी ने उठाए सवाल

कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने भी रिपोर्ट का हवाला देते हुए चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यदि रिपोर्ट में बताए गए तथ्य सही हैं तो यह जांच का विषय हो सकता है कि आयोग के भीतर फैसले किस प्रक्रिया से लिए गए।

तिवारी ने यह भी कहा कि यदि किसी संवैधानिक संस्था में निर्णय निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप नहीं लिए जाते तो उनकी वैधता को लेकर बहस खड़ी हो सकती है। हालांकि उन्होंने अपने बयान को रिपोर्ट में प्रकाशित दावों के आधार पर रखा और कहा कि वास्तविक स्थिति सामने आना आवश्यक है।

डेरेक ओ'ब्रायन ने दोहराई मांग

तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा सांसद डेरेक ओ'ब्रायन ने भी इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने से जुड़े राज्यसभा प्रस्ताव का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि रिपोर्ट सामने आने के बाद इस विषय पर और गंभीर चर्चा की आवश्यकता है।

ओ'ब्रायन ने सोशल मीडिया पोस्ट में चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और पारदर्शिता को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि विपक्षी दल पहले भी आयोग की कुछ प्रक्रियाओं को लेकर अपनी चिंताएं व्यक्त कर चुके हैं।

फॉर्म-6 को लेकर क्या है विवाद?

रिपोर्ट में फॉर्म-6 का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है। फॉर्म-6 वह आवेदन पत्र है जिसका उपयोग नए मतदाता के रूप में पंजीकरण के लिए किया जाता है। रिपोर्ट के अनुसार जुलाई 2026 में इस फॉर्म में एक अतिरिक्त प्रश्न जोड़ा गया था, जिसमें आवेदक से यह जानकारी मांगी गई कि वह या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी पूर्व में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान तैयार मतदाता सूची में शामिल थे या नहीं।

रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने इस बदलाव को लेकर प्रश्न उठाया था और कहा था कि वैधानिक फॉर्म में परिवर्तन के लिए संबंधित नियमों में संशोधन आवश्यक हो सकता है। रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने भी इस विषय पर चिंता व्यक्त की थी।

हालांकि इस मुद्दे पर चुनाव आयोग की आधिकारिक स्थिति यही रही है कि चुनावी प्रक्रियाएं कानून और नियमों के अनुरूप संचालित की जाती हैं।

मतदाता डेटाबेस को लेकर भी चिंता

रिपोर्ट में दावा किया गया कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने मतदाता डेटाबेस के प्रबंधन और उसकी निगरानी को लेकर भी सवाल उठाए थे। रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने मतदाता डेटा के संचालन के क्रमशः अधिक केंद्रीकृत होने और आईटी ढांचे के प्रबंधन को लेकर अपनी राय दर्ज कराई थी।

एक अन्य मामले में चुनावी डेटा से संबंधित तकनीकी कार्यों के बंटवारे को लेकर भी पत्राचार का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक दोनों आयुक्तों ने इस संबंध में अलग-अलग स्तर पर अपनी चिंताएं व्यक्त की थीं। हालांकि इन दावों पर चुनाव आयोग की ओर से कोई विस्तृत सार्वजनिक टिप्पणी सामने नहीं आई है।

गोवा के मामले का भी जिक्र

रिपोर्ट में गोवा का एक मामला भी शामिल किया गया है। दावा किया गया कि कुछ मतदाताओं के नाम से जुड़े मामलों में स्थानीय स्तर पर निर्णय होने के बावजूद सॉफ्टवेयर में आवश्यक बदलाव दर्ज नहीं हो सके। रिपोर्ट के अनुसार राज्य के अधिकारियों ने इस तकनीकी समस्या को दूर करने के लिए कई बार अनुरोध किया था।

हालांकि इस मामले पर भी चुनाव आयोग की ओर से कोई स्वतंत्र सार्वजनिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है।

चुनाव आयोग का जवाब

इन रिपोर्टों के सामने आने के बाद चुनाव आयोग से जुड़े अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि SIR सहित आयोग के सभी महत्वपूर्ण फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति और सर्वसम्मति से लिए गए हैं। आयोग का कहना है कि किसी भी संवैधानिक संस्था में विभिन्न विषयों पर चर्चा, सुझाव और आपत्तियां आंतरिक विचार-विमर्श की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा होती हैं।

अधिकारियों के अनुसार अंतिम निर्णय लेने से पहले विभिन्न पहलुओं पर चर्चा होना स्वाभाविक है, लेकिन आयोग द्वारा जारी किए गए फैसले सामूहिक निर्णय प्रक्रिया के तहत ही लिए गए हैं।

SIR को लेकर पहले से जारी है बहस

गौरतलब है कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया को लेकर पहले से ही राजनीतिक बहस चल रही है। विपक्षी दलों का कहना है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान पात्र मतदाताओं के नाम प्रभावित हो सकते हैं, जबकि चुनाव आयोग का कहना है कि यह प्रक्रिया मतदाता सूची को अधिक सटीक और अद्यतन बनाने के लिए की जाती है।

यही कारण है कि चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों की रिपोर्ट सामने आने के बाद इस मुद्दे ने और अधिक राजनीतिक महत्व हासिल कर लिया है।

राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप जारी

रिपोर्ट के बाद कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं। दूसरी ओर चुनाव आयोग का कहना है कि उसके सभी निर्णय संवैधानिक और कानूनी प्रक्रियाओं के अनुरूप लिए गए हैं तथा आयोग की संस्थागत व्यवस्था मजबूत और पारदर्शी है।

फिलहाल यह मुद्दा राजनीतिक और संवैधानिक बहस का विषय बना हुआ है। आने वाले दिनों में चुनाव आयोग की ओर से यदि कोई विस्तृत स्पष्टीकरण या आधिकारिक प्रतिक्रिया आती है तो इस विवाद की दिशा और स्पष्ट हो सकती है। हालांकि अभी तक उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह साफ है कि रिपोर्ट में किए गए दावे और विपक्ष के आरोप एक तरफ हैं, जबकि चुनाव आयोग अपने निर्णयों को सर्वसम्मति से लिया गया और नियमसम्मत बता रहा है।