प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, हादसा इतना अचानक हुआ कि लोगों को संभलने का मौका तक नहीं मिला। सुरंग निर्माण के दौरान निकाली गई मिट्टी को बाहर जमा किया गया था। लगातार हो रही भारी बारिश के कारण यह मिट्टी खिसक गई और देखते ही देखते बड़ी मात्रा में मलबा नीचे आ गया। मलबे के साथ पेड़ उखड़ गए और निर्माण स्थल पर लगाए गए बैरिकेड भी बह गए।
लैंडस्लाइड का एक सीसीटीवी फुटेज भी सामने आया है। फुटेज में दिखाई दे रहा है कि 7 जुलाई की सुबह करीब 11 बजकर 15 मिनट पर सुरंग क्षेत्र की ओर से तेज बहाव के साथ मलबा आया। मलबे का बहाव इतना तेज था कि उसने एक टैंकर को तिनके की तरह बहा दिया। इस दौरान दो लोग मलबे की चपेट में आ गए।
हादसे के बाद आसपास के लोगों ने तुरंत बचाव कार्य शुरू किया और प्रशासन को सूचना दी। राहत टीमों ने मौके पर पहुंचकर रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया। स्थानीय लोगों का कहना है कि भारी मात्रा में जमा मलबा हटाने के लिए बड़ी मशीनों की जरूरत होगी।
अधिकारियों के अनुसार, लगातार बारिश के चलते सोमवार से ही टनल निर्माण का काम रोक दिया गया था। इसके बावजूद निर्माण स्थल के पास जमा मिट्टी बारिश के दबाव को नहीं झेल सकी और खिसक गई।
मलप्पुरम-वायनाड टनल प्रोजेक्ट के तहत दोनों जिलों को एक सुरंग के माध्यम से जोड़ने की योजना है। इस परियोजना के तहत बनने वाली सुरंग की लंबाई करीब 8.17 किलोमीटर है और इसकी अनुमानित लागत लगभग 2100 से 2200 करोड़ रुपये बताई जा रही है।
वायनाड के भौगोलिक हालात इसे भूस्खलन के लिए संवेदनशील बनाते हैं। यह केरल का एकमात्र पठारी क्षेत्र है, जहां ऊंचे-नीचे पहाड़ी ढलान, मिट्टी और चट्टानों की संरचना मौजूद है। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) की रिपोर्ट के अनुसार, केरल का बड़ा हिस्सा लैंडस्लाइड प्रभावित क्षेत्र में आता है।
वायनाड की करीब 51 प्रतिशत जमीन पहाड़ी ढलानों पर स्थित है, जिसके कारण मानसून के दौरान यहां भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है। यह इलाका पश्चिमी घाट में करीब 700 से 2100 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। अरब सागर से आने वाली मानसूनी हवाएं पश्चिमी घाट से टकराकर ऊपर उठती हैं, जिससे इस क्षेत्र में भारी बारिश होती है।
वायनाड में दो साल पहले भी भीषण लैंडस्लाइड हुआ था। 30 जुलाई 2024 की रात मुंडक्कई, चूरलमाला, अट्टामाला और नूलपुझा गांवों में हुए भूस्खलन ने भारी तबाही मचाई थी। इस हादसे में 400 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी और बड़ी संख्या में लोग प्रभावित हुए थे।
इससे पहले 2019 में भी भारी बारिश के कारण इन्हीं इलाकों में लैंडस्लाइड की घटना हुई थी। उस हादसे में 17 लोगों की मौत हुई थी, जबकि 52 घर पूरी तरह तबाह हो गए थे।
भारत में जून से सितंबर के मानसून सीजन के दौरान सबसे ज्यादा भूस्खलन की घटनाएं होती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, 80 प्रतिशत से अधिक लैंडस्लाइड भारी बारिश के कारण होते हैं। इसके अलावा सड़क निर्माण, सुरंग परियोजनाएं, बांध निर्माण, खनन और जंगलों की कटाई जैसी गतिविधियां भी पहाड़ी क्षेत्रों में खतरा बढ़ा सकती हैं।
हिमालय और पश्चिमी घाट भारत के सबसे संवेदनशील लैंडस्लाइड क्षेत्र माने जाते हैं। केरल के अलावा हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और दार्जिलिंग जैसे क्षेत्र भी भूस्खलन की घटनाओं से प्रभावित होते हैं।
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण देशभर में लैंडस्लाइड सस्प्टिबिलिटी मैप तैयार कर रहा है, ताकि संवेदनशील इलाकों की पहचान की जा सके और समय रहते चेतावनी जारी की जा सके।
फिलहाल वायनाड में बचाव अभियान जारी है। प्रशासन ने लोगों से सतर्क रहने और पहाड़ी इलाकों में अनावश्यक आवाजाही से बचने की अपील की है।