World

चीन-रूस के बाद अमेरिका भी डीजल एक्सपोर्ट रोकने पर कर रहा विचार, ग्लोबल ऑयल मार्केट में बढ़ी हलचल; भारत ने बदली रणनीति

नई दिल्ली। दुनिया के बड़े ईंधन बाजारों में इस समय सप्लाई को लेकर दबाव बढ़ता जा रहा है। चीन ने अक्टूबर के लिए हांगकांग और मकाऊ को छोड़कर अन्य जगहों पर तेल उत्पादों के निर्यात को रोक दिया है। रूस ने भी डीजल एक्सपोर्ट पर लगी पाबंदी को अक्टूबर के अंत तक बढ़ा दिया है। वहीं, अमेरिका में भी डीजल के निर्यात पर संभावित रोक को लेकर चर्चा चल रही है। इन घटनाक्रमों के बीच भारत की तेल कंपनियों ने कच्चा तेल खरीदने और उसके परिवहन की रणनीति में बदलाव शुरू किया है।

चीन ने अक्टूबर में तेल उत्पादों का एक्सपोर्ट रोका

रॉयटर्स के मुताबिक, चीनी रिफाइनरियों ने बीजिंग से अगली सूचना तक हांगकांग और मकाऊ के बाहर तेल उत्पादों की सप्लाई रोक दी है। सरकारी तेल कंपनी पेट्रोचाइना ने अक्टूबर में भेजे जाने वाले गैसोलीन और जेट फ्यूल के कुछ शिपमेंट रद्द कर दिए हैं। वहीं, Zhejiang Petrochemical Corp (ZPC) ने छुट्टियों वाले सप्ताह के दौरान तेल उत्पादों की शिपमेंट तय नहीं की।

रिपोर्ट के अनुसार, चीन का यह फैसला घरेलू ईंधन भंडार और सप्लाई को प्राथमिकता देने की रणनीति से जुड़ा है। अगस्त में चीन ने करीब 45.8 लाख टन गैसोलीन, डीजल और जेट फ्यूल का निर्यात किया था। ऐसे में चीन की सप्लाई में कमी एशियाई ईंधन बाजार पर असर डाल सकती है।

रूस ने अक्टूबर तक बढ़ाई डीजल एक्सपोर्ट पर रोक

रूस ने भी डीजल निर्यात पर लगी पाबंदी को अक्टूबर के अंत तक बढ़ा दिया है। रॉयटर्स के मुताबिक, यह प्रतिबंध घरेलू ईंधन बाजार में सप्लाई और कीमतों को स्थिर रखने के उद्देश्य से जारी रखा गया है। यूक्रेनी ड्रोन हमलों से रूसी रिफाइनरियों के संचालन पर भी असर पड़ा है, जिससे घरेलू बाजार में ईंधन उपलब्धता को लेकर दबाव बढ़ा है।

रूस दुनिया के बड़े डीजल निर्यातकों में शामिल है। इसलिए उसके एक्सपोर्ट में लंबे समय तक कमी रहने से वैश्विक डीजल बाजार पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

अमेरिका में भी डीजल एक्सपोर्ट पर रोक की चर्चा

अमेरिका में भी डीजल की बढ़ती कीमतों के बीच निर्यात पर संभावित रोक को लेकर चर्चा तेज हुई है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि डीजल निर्यात पर रोक लगाने के विकल्प पर लगातार विचार किया जा रहा है। प्रशासन का तर्क है कि इससे घरेलू बाजार में डीजल की उपलब्धता बढ़ाकर कीमतों पर दबाव कम किया जा सकता है। हालांकि, ऐसी रोक से अमेरिका के बाहर सप्लाई और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों के बाजार पर भी असर पड़ने की आशंका जताई गई है।

रॉयटर्स के अनुसार, अमेरिका में डीजल की कीमत हाल में रिकॉर्ड स्तर तक पहुंची है और घरेलू डिस्टिलेट भंडार भी दबाव में हैं।

सऊदी सप्लाई में व्यवधान से भी बढ़ी चिंता

मध्य-पूर्व में सप्लाई को लेकर पहले से ही अनिश्चितता बनी हुई है। सितंबर में सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन पर ड्रोन हमले के बाद कुछ यूरोपीय ग्राहकों के लिए कच्चे तेल की सप्लाई प्रभावित हुई थी। यानबू बंदरगाह से लोडिंग भी प्रभावित हुई थी। बाद में पाइपलाइन का संचालन बहाल होने के बाद वहां से टैंकर लोडिंग दोबारा शुरू हुई।

इसके अलावा, फारस की खाड़ी से तेल की आवाजाही में जोखिम बढ़ने और टैंकरों की उपलब्धता कम होने से परिवहन लागत भी बढ़ी है। ब्लूमबर्ग ने बताया है कि सुपरटैंकरों की कमी से लंबी दूरी के कच्चे तेल कारोबार पर दबाव बढ़ रहा है।

भारत ने भी बदली कच्चा तेल खरीदने की रणनीति

वैश्विक सप्लाई में बढ़ते जोखिम का असर भारतीय रिफाइनरियों की रणनीति पर भी दिखाई दे रहा है। स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज के आसपास जोखिम बढ़ने के कारण पहले भारतीय कंपनियां इस क्षेत्र में अपने जहाज भेजने से बच रही थीं। कई मामलों में ट्रेडिंग कंपनियों या गल्फ देशों के जहाजों के जरिए कच्चा तेल भारत पहुंचाया जा रहा था।

इस व्यवस्था में भारतीय कंपनियों का प्रत्यक्ष जोखिम कम था, लेकिन बढ़ी हुई फ्रेट लागत के कारण तेल की खरीद महंगी पड़ रही थी।

अब भारतीय कंपनियां खुद चार्टर कर रही हैं टैंकर

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय रिफाइनर अब खुद टैंकर चार्टर करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन, रिलायंस इंडस्ट्रीज, भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन और एचपीसीएल-मित्तल एनर्जी ने इराकी कच्चे तेल की FOB आधार पर खरीद की है।

FOB व्यवस्था में तेल जहाज पर लोड होने के बाद उसके परिवहन और उससे जुड़े जोखिम की जिम्मेदारी खरीदार की होती है। ऐसे में भारतीय कंपनियों का यह कदम सप्लाई को अपने नियंत्रण में रखने और परिवहन लागत को बेहतर तरीके से मैनेज करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

आगे पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर क्या असर?

चीन और रूस से ईंधन एक्सपोर्ट में कमी और अमेरिका में संभावित प्रतिबंध की चर्चा ऐसे समय हो रही है, जब वैश्विक डीजल बाजार पहले से ही दबाव में है। यदि बड़े निर्यातक देशों से सप्लाई लंबे समय तक सीमित रहती है और मांग बनी रहती है तो अंतरराष्ट्रीय ईंधन कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है।

भारत के लिए स्थिति खास तौर पर महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमत, फ्रेट लागत और समुद्री मार्गों में जोखिम—तीनों का असर घरेलू ईंधन बाजार पर पड़ सकता है। फिलहाल भारतीय कंपनियों का टैंकर खुद चार्टर करने का फैसला इसी बदलते वैश्विक माहौल के बीच सप्लाई को सुरक्षित रखने की दिशा में उठाया गया कदम है।