यह मामला 14 मार्च 2025 की रात सामने आया था, जब दिल्ली स्थित उनके सरकारी आवास में आग लग गई थी। आग बुझाने के लिए पहुंचे दमकलकर्मियों को घर के एक स्टोर रूम में बड़ी मात्रा में जले हुए 500 रुपये के नोट मिले थे। इस घटना ने न्यायपालिका और राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी थी।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा गठित तीन सदस्यीय जांच समिति ने मामले की विस्तृत जांच के बाद अपनी रिपोर्ट मई 2026 में सौंप दी थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि स्टोर रूम में मिली नकदी की मात्रा और परिस्थितियां बेहद गंभीर थीं। जांच के दौरान जस्टिस वर्मा से कई बार नकदी के स्रोत और स्वामित्व के संबंध में जानकारी मांगी गई, लेकिन उनके जवाब समिति को संतोषजनक नहीं लगे।
समिति ने स्पष्ट रूप से कहा कि इतनी बड़ी मात्रा में नकदी का सरकारी आवास में पाया जाना और उसके संबंध में स्पष्ट जानकारी न होना गंभीर चिंता का विषय है। रिपोर्ट के अनुसार उपलब्ध तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर जस्टिस वर्मा की जवाबदेही बनती है।
रिपोर्ट में एक और महत्वपूर्ण पहलू का उल्लेख किया गया है। समिति ने कहा कि जिस स्टोर रूम में नकदी मिली थी, उसकी स्थिति जांच शुरू होने से पहले बदल दी गई थी। कानूनी प्रक्रिया के तहत कमरे को सील कर वैज्ञानिक जांच किए जाने से पहले वहां मौजूद सबूतों की स्थिति में परिवर्तन हुआ।
समिति ने यह भी सवाल उठाया कि बाद में स्टोर रूम से नकदी का गायब होना या उपलब्ध नहीं होना अब तक स्पष्ट नहीं हो सका है। जांचकर्ताओं के अनुसार यह पहलू मामले को और अधिक गंभीर बनाता है, क्योंकि इससे साक्ष्यों के संरक्षण को लेकर प्रश्न खड़े होते हैं।
नकदी मिलने के बाद जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ संसद में महाभियोग जैसी हटाने की प्रक्रिया शुरू की गई थी। हालांकि बाद में उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उनके इस्तीफे के बाद संसद में चल रही हटाने की प्रक्रिया प्रभावी नहीं रह गई।
विवाद के दौरान उन्हें दिल्ली हाईकोर्ट से उनके मूल कैडर वाले इलाहाबाद हाईकोर्ट में स्थानांतरित कर दिया गया था। हालांकि अब तक उनके इस्तीफे को कानून मंत्रालय की ओर से औपचारिक रूप से अधिसूचित नहीं किया गया है।
जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर मामले में कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई पर विचार किया जाना चाहिए। समिति ने संकेत दिया है कि यह केवल प्रशासनिक मामला नहीं है, बल्कि इसमें जवाबदेही और कानूनी पहलुओं की भी गहन समीक्षा आवश्यक है।
संसद में रिपोर्ट पेश होने के बाद इस मामले पर राजनीतिक और कानूनी बहस तेज होने की संभावना है। न्यायपालिका की पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर भी यह मामला आने वाले दिनों में चर्चा का केंद्र बना रह सकता है।