डॉक्टर संगठनों का कहना है कि मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं से जुड़े विवाद, छात्रों में बढ़ती असंतुष्टि और हाल के घटनाक्रमों ने देश की चिकित्सा शिक्षा प्रणाली तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता के विश्वास को प्रभावित किया है। इसलिए समय रहते सुधारात्मक कदम उठाना आवश्यक है।
इस अभियान में सबसे प्रमुख भूमिका अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) नई दिल्ली के रेजिडेंट डॉक्टर एसोसिएशन (RDA) की रही है। एसोसिएशन ने राष्ट्रपति को लिखे पत्र में जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कथित पुलिस कार्रवाई को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है।
पत्र में कहा गया है कि सोशल मीडिया, वीडियो फुटेज और प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों में छात्रों, डॉक्टरों और अन्य प्रदर्शनकारियों के साथ बल प्रयोग, लाठीचार्ज और आंसू गैस के इस्तेमाल के आरोप सामने आए हैं। डॉक्टरों का मानना है कि इन घटनाओं की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए ताकि सच्चाई सामने आ सके।
आरडीए ने यह भी कहा कि लोकतंत्र में नागरिकों को शांतिपूर्ण विरोध और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। ऐसे में किसी भी विरोध प्रदर्शन से निपटते समय संयम, जवाबदेही और मानवीय गरिमा का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए।
एम्स के डॉक्टरों ने उन वीडियो का भी उल्लेख किया है जिनमें कुछ पुलिसकर्मी कथित रूप से अपना चेहरा और नाम-पट्टिका छिपाए हुए दिखाई दे रहे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि यदि ऐसा हुआ है तो यह पारदर्शिता और जवाबदेही के सिद्धांतों के विपरीत है।
ज्ञापन में कहा गया कि कानून व्यवस्था बनाए रखने वाली एजेंसियों की विश्वसनीयता तभी कायम रह सकती है जब उनकी कार्रवाई पूरी तरह पारदर्शी और जवाबदेह हो। इसलिए इन आरोपों की भी निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
डॉक्टर संगठनों ने कुछ ऐसे वीडियो और रिपोर्टों पर भी चिंता जताई है, जिनमें कथित रूप से मेडिकल कॉलेजों के शिक्षकों और छात्रों के साथ आक्रामक व्यवहार दिखाई देता है। एम्स आरडीए ने कहा कि यदि ऐसे आरोप सही हैं तो यह अत्यंत गंभीर मामला है और इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
डॉक्टरों का कहना है कि शिक्षा संस्थानों से जुड़े लोगों के साथ किसी भी प्रकार का अनुचित व्यवहार न केवल शैक्षणिक माहौल को प्रभावित करता है बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
डॉक्टर संगठनों की ओर से उठाया गया दूसरा प्रमुख मुद्दा पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक से जुड़ा है। ज्ञापनों में अस्पताल में उनकी स्थिति और चिकित्सा प्रक्रिया को लेकर भी स्पष्टीकरण मांगा गया है।
एम्स आरडीए ने कहा कि कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया है कि सोनम वांगचुक ने मेडिकल सलाह के विपरीत अस्पताल छोड़ने की इच्छा जताई थी, लेकिन उन्हें जाने की अनुमति नहीं दी गई। यदि ऐसा हुआ है तो यह मरीज की स्वायत्तता, सूचित सहमति और चिकित्सा नैतिकता से जुड़े गंभीर सवाल खड़े करता है।
डॉक्टरों ने कहा कि चिकित्सा व्यवस्था का मूल उद्देश्य मरीज के अधिकारों और उसकी गरिमा की रक्षा करना है। इसलिए इस विषय पर स्पष्ट और पारदर्शी जानकारी सामने आनी चाहिए।
वर्धमान महावीर मेडिकल कॉलेज (VMMC) और सफदरजंग अस्पताल के रेजिडेंट डॉक्टर एसोसिएशन ने भी इस मुद्दे पर अपनी चिंता दर्ज कराई है। उनका कहना है कि अस्पतालों को केवल उपचार और स्वास्थ्य सेवाओं का केंद्र बने रहना चाहिए।
डॉक्टरों ने अस्पताल परिसर में असाधारण सुरक्षा व्यवस्था, वार्डों तक पहुंच पर प्रतिबंध और भारी पुलिस बल की तैनाती को लेकर सवाल उठाए। उनका कहना है कि ऐसी परिस्थितियां अस्पतालों के सामान्य कार्य और मरीजों की देखभाल को प्रभावित कर सकती हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि अस्पतालों को किसी भी स्थिति में ऐसा नहीं दिखना चाहिए कि वे कानून प्रवर्तन एजेंसियों के विस्तार के रूप में कार्य कर रहे हों।
डॉक्टर संगठनों ने मेडिकल प्रवेश परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार की मांग भी दोहराई है। उनका कहना है कि हाल के वर्षों में प्रवेश परीक्षाओं को लेकर उठे विवादों ने छात्रों और अभिभावकों के बीच असुरक्षा की भावना पैदा की है।
उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि परीक्षा प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और तकनीकी रूप से मजबूत बनाया जाए, ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार के विवाद या अविश्वास की स्थिति पैदा न हो।
रेजिडेंट डॉक्टर संगठनों ने स्पष्ट किया है कि उनकी पहल किसी राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित नहीं है। उनका कहना है कि वे केवल चिकित्सा समुदाय, छात्रों और नागरिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर अपनी चिंता व्यक्त कर रहे हैं।
डॉक्टरों ने उम्मीद जताई कि सरकार, प्रशासन और संबंधित पक्ष संवाद और सहयोग के माध्यम से इन मुद्दों का समाधान निकालेंगे। उनका मानना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में बातचीत और पारदर्शिता ही किसी भी विवाद का सबसे प्रभावी समाधान है।
विशेषज्ञों का मानना है कि देश की चिकित्सा शिक्षा व्यवस्था और स्वास्थ्य संस्थानों पर जनता का भरोसा बनाए रखना बेहद महत्वपूर्ण है। डॉक्टर संगठनों का कहना है कि निष्पक्ष जांच, पारदर्शी प्रशासन और संस्थागत सुधारों के जरिए ही यह भरोसा मजबूत किया जा सकता है।
इसी उद्देश्य से देशभर के रेजिडेंट डॉक्टर अब एक साझा मंच पर आकर चिकित्सा शिक्षा, मरीजों के अधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों से जुड़े मुद्दों पर अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं। उनके अनुसार यह केवल डॉक्टरों या छात्रों का मुद्दा नहीं, बल्कि देश की संस्थाओं में जनता के विश्वास से जुड़ा प्रश्न है।