आसाराम और अन्य सह-आरोपियों द्वारा दायर इस अपील पर पिछले कई दिनों से सघन सुनवाई चल रही थी।
बचाव और पक्ष: आसाराम के वकीलों ने 17 अप्रैल को अपनी दलीलें पूरी की थीं। इसके बाद पीड़िता के वकील पी. सी. सोलंकी ने कोर्ट के समक्ष प्रभावी पैरवी की।
अंतिम निर्णय सुरक्षित: 20 अप्रैल को खंडपीठ ने राज्य सरकार और बचाव पक्ष की जिरह पूरी होने के बाद फैसला सुरक्षित कर लिया। अब कोर्ट तय करेगा कि निचली अदालत द्वारा दी गई 'अंतिम सांस तक उम्रकैद' की सजा बरकरार रहेगी या उसमें कोई बदलाव होगा।
यह मामला साल 2013 का है, जब जोधपुर के मणाई गांव स्थित आश्रम में एक नाबालिग लड़की के साथ यौन उत्पीड़न का आरोप लगा था।
ऐतिहासिक फैसला: 25 अप्रैल 2018 को विशेष पॉक्सो कोर्ट के न्यायाधीश मधुसूदन शर्मा ने जेल के भीतर ही सुनवाई करते हुए आसाराम को दोषी ठहराया और अंतिम सांस तक उम्रकैद की सजा सुनाई।
सह-आरोपी: मामले में शिल्पी और शिवा को भी 20-20 साल की सजा मिली थी, जिन्होंने आसाराम के साथ ही इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी है।
इसी दौरान आसाराम की ओर से खराब सेहत का हवाला देते हुए मेडिकल जमानत (Interim Bail) की अवधि बढ़ाने के लिए एक प्रार्थना पत्र भी लगाया गया था।
शीघ्र सुनवाई से इनकार: 15 अप्रैल को लगाई गई इस अर्जी पर 16 अप्रैल को सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया। कोर्ट ने पूछा कि जब मुख्य अपील पर सुनवाई चल रही है, तो जमानत के लिए इतनी जल्दबाजी क्यों की जा रही है?
नियमित प्रक्रिया: अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि मेडिकल बेल की अर्जी पर रजिस्ट्री द्वारा तय की गई नियमित तारीख पर ही विचार किया जाएगा, इसमें किसी तरह की 'अर्जेंट हियरिंग' की आवश्यकता नहीं है।
पीड़िता के वकील पी. सी. सोलंकी ने बहस के दौरान निचली अदालत के साक्ष्यों और गवाहों के बयानों को मजबूती से रखा। उन्होंने कोर्ट को बताया कि ट्रायल कोर्ट ने गहन जांच के बाद ही आसाराम को दोषी माना था, इसलिए सजा में किसी भी तरह की राहत नहीं दी जानी चाहिए।
अब सभी की निगाहें हाईकोर्ट के आने वाले फैसले पर टिकी हैं। यदि हाईकोर्ट निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखता है, तो आसाराम को अपनी पूरी उम्र जेल में ही बितानी होगी। वहीं, बचाव पक्ष के पास इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने का विकल्प खुला रहेगा।