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केवल टॉपर नहीं, विचारशील बच्चे गढ़ें: वैकल्पिक शिक्षा से जीवन की तैयारी

डॉ. नेहा लोहमरोर, पीएच.डी. (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली), संस्थापक एवं निदेशक, कोश फाउंडेशन

हर वर्ष जब NEET जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं के परिणाम घोषित होते हैं, तब रैंक और अंकों की उपलब्धियों के साथ एक दूसरी कहानी भी सामने आती है। यह कहानी है अत्यधिक दबाव, लगातार कोचिंग, रातों की नींद खोने, चिंता और उस बढ़ती चिंता की, जिसमें अनेक विद्यार्थी अपने आत्म-मूल्य को एक ही परीक्षा के परिणाम से जोड़ने लगते हैं। हम टॉपर्स का उत्सव मनाते हैं, लेकिन शायद ही कभी ठहरकर यह मूलभूत प्रश्न पूछते हैं—क्या हम विचारशील बच्चों का निर्माण कर रहे हैं?

अंक शैक्षणिक दक्षता के आकलन और उच्च शिक्षा में चयन के लिए उपयोगी हैं। लेकिन शिक्षा को केवल रैंक की दौड़ तक सीमित नहीं किया जा सकता। शिक्षा का उद्देश्य केवल बच्चों को परीक्षाओं के लिए तैयार करना नहीं, बल्कि उन्हें जीवन के लिए तैयार करना है। यदि विद्यालय ऐसे विद्यार्थी तैयार करते हैं जो समीकरण हल कर सकते हैं, लेकिन नई और अपरिचित समस्याओं का समाधान करने में कठिनाई महसूस करते हैं; पृथ्वी के घूर्णन को समझते हैं, लेकिन मानवीय भावनाओं को समझने में संघर्ष करते हैं; तथ्यों को याद कर सकते हैं, लेकिन नई संभावनाओं की कल्पना करने में कठिनाई महसूस करते हैं—तो हमें स्वयं से पूछना होगा कि क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था अपने व्यापक उद्देश्य को पूरा कर रही है।

वास्तविक प्रश्न केवल यह नहीं है कि बच्चे क्या दोहरा सकते हैं, बल्कि यह है कि वे क्या नया बना सकते हैं, क्या प्रश्न कर सकते हैं और अपने ज्ञान को वास्तविक परिस्थितियों में कैसे लागू कर सकते हैं।

यही प्रश्न कोश फाउंडेशन के कार्य का एक महत्वपूर्ण आधार रहा है। यह एक गैर-लाभकारी संस्था है, जो वैकल्पिक और अनुभवात्मक शिक्षा के लिए सुलभ अवसर और वातावरण विकसित करने की दिशा में काम करती है। यहाँ वैकल्पिक शिक्षा का अर्थ शिक्षा से बाहर सीखना नहीं, बल्कि पारंपरिक कक्षा-पद्धति से आगे शिक्षा के दायरे का विस्तार करना है। पिछले कुछ महीनों में हमने ओरिगामी, जर्नल लेखन, कोलाज निर्माण, आटे से आकृतियाँ बनाना, ब्लॉब पेंटिंग, फोटोग्राफी, कॉमिक निर्माण और “Walking as Learning” यानी “चलना भी सीखना है” जैसी अनेक कार्यशालाएँ और अनुभवात्मक गतिविधियाँ आयोजित की हैं। पहली नजर में ये केवल मनोरंजक गतिविधियाँ लग सकती हैं। वास्तव में, ये ऐसी सोच-समझकर तैयार की गई शैक्षणिक गतिविधियाँ हैं, जो उन क्षमताओं को विकसित करती हैं जिन्हें पारंपरिक कक्षाएँ अक्सर पर्याप्त रूप से विकसित नहीं कर पातीं।

उदाहरण के लिए, ओरिगामी को ही लें। कागज की एक साधारण शीट धैर्य, स्थानिक समझ, क्रमबद्धता और समस्या-समाधान का अभ्यास बन जाती है। गणित बच्चों को सूत्रों या परीक्षा के दबाव के बिना स्वाभाविक रूप से समझ में आने लगता है। कॉमिक बनाना लेखन, चित्रकला, कहानी कहने और दृश्य सोच को एक साथ जोड़ता है। जब बच्चे पात्र और कथाएँ बनाते हैं, तो वे विचारों को व्यवस्थित करना, भावनाओं को समझना, प्रभावी ढंग से संवाद करना और दूसरे दृष्टिकोणों को स्वीकार करना सीखते हैं। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्हें यह एहसास होता है कि उनके अपने अनुभव और विचार भी अभिव्यक्ति के योग्य हैं।

फोटोग्राफी आज की लगातार विचलित होती दुनिया में बच्चों को एक ऐसी चीज सिखाती है, जो तेजी से दुर्लभ होती जा रही है—अवलोकन की कला। कैमरे का बटन दबाने से पहले बच्चे प्रकाश, रंग, आकृतियों, भाव-भंगिमाओं और उन क्षणों को देखना सीखते हैं, जिन्हें दूसरे लोग अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। फोटोग्राफी उन्हें कुछ पल ठहरना और वास्तव में देखना सिखाती है।

जर्नल लेखन आत्मचिंतन विकसित करता है। यह बच्चों को अपने विचार व्यवस्थित करने, अनुभव दर्ज करने, भावनाएँ व्यक्त करने और अपने आसपास की दुनिया को समझने के लिए एक निजी स्थान देता है। कोलाज निर्माण यह दिखाता है कि देखने में असंबंधित लगने वाले टुकड़े भी एक साथ मिलकर अर्थपूर्ण रचना बना सकते हैं। ब्लॉब पेंटिंग कल्पनाशक्ति को विकसित करती है और बच्चों को यह समझाती है कि रचनात्मकता की शुरुआत हमेशा पूर्णता से नहीं, बल्कि अनिश्चितता से भी हो सकती है। इसी प्रकार, आटे से आकृतियाँ बनाना, जिसे अक्सर केवल खेल समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है, बच्चों के सूक्ष्म मोटर कौशल, त्रि-आयामी सोच और आत्मविश्वास को मजबूत करता है। बच्चे अमूर्त विचारों को अपने हाथों से ठोस रूप देना सीखते हैं।

हमारी सबसे सार्थक पहलों में से एक रही है—“Walking as Learning” अर्थात “चलना भी सीखना है।” हम बच्चों को केवल व्यायाम के लिए चलने के बजाय आसपास के मोहल्लों, पार्कों और ऐतिहासिक स्थलों को जिज्ञासु दृष्टि से देखने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। इन यात्राओं के दौरान वे पेड़ों, वास्तुकला, पक्षियों, लोगों और सार्वजनिक स्थानों को देखते हैं। वे कूड़ा फैलाने, सार्वजनिक स्थानों की सुविधाओं और अलग-अलग लोगों के सार्वजनिक स्थानों के अलग-अलग अनुभव जैसी रोजमर्रा की सामाजिक चुनौतियों को भी पहचान सकते हैं। इस तरह पूरी दुनिया एक कक्षा बन जाती है, जो ऐसे पाठ देती है जिन्हें कोई अकेली पाठ्यपुस्तक पूरी तरह नहीं दे सकती।

इन सभी गतिविधियों को जोड़ने वाली सबसे महत्वपूर्ण बात है—निष्क्रिय सीखने से सक्रिय खोज की ओर बढ़ना। बच्चे स्वयं जाँच करते हैं, निर्माण करते हैं, प्रयोग करते हैं, गलतियाँ करते हैं, साथ मिलकर काम करते हैं और खोजते हैं। सीखना आनंददायक बन जाता है क्योंकि वह केवल याद करने पर नहीं, बल्कि अनुभव पर आधारित होता है।

यह दृष्टिकोण राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 की सोच से भी गहराई से जुड़ता है, जिसमें अनुभवात्मक शिक्षा, रचनात्मकता, आलोचनात्मक चिंतन और बहुविषयक शिक्षा पर जोर दिया गया है। लेकिन केवल पाठ्यक्रम में बदलाव से शिक्षा का वास्तविक अनुभव नहीं बदल सकता। वास्तविक चुनौती ऐसे वातावरण तैयार करने की है, जहाँ बच्चे प्रश्न पूछने, विचारों का अन्वेषण करने, गलतियाँ करने और बिना लगातार मूल्यांकन के भय के सीखने के लिए स्वतंत्र हों। इसके लिए शिक्षकों को भी ऐसे अवसर और समर्थन देने होंगे, जिससे वे केवल जानकारी देने वाले नहीं, बल्कि सीखने की प्रक्रिया के मार्गदर्शक बन सकें।

कोश फाउंडेशन के अनुभव ने हमें दिखाया है कि बच्चों को रचनात्मक और नवाचारी विचारक बनाने के लिए हमेशा महंगी तकनीक या अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं की आवश्यकता नहीं होती। उन्हें कागज, रंग, मिट्टी, कैमरा, नोटबुक या केवल चलने के लिए एक रास्ता दे दीजिए—वे असाधारण प्रश्न पूछना शुरू कर देते हैं। वे अधिक ध्यान से देखते हैं, अधिक आत्मविश्वास से संवाद करते हैं, अधिक सहजता से सहयोग करते हैं और ऐसी क्षमताओं को खोजते हैं, जिन्हें पारंपरिक कक्षाएँ कई बार अनदेखा कर देती हैं।

यह बात कृत्रिम बुद्धिमत्ता के तेजी से बढ़ते प्रभाव वाले वर्तमान दौर में और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता जानकारी उपलब्ध करा सकती है, लेख तैयार कर सकती है, समस्याएँ हल कर सकती है और विशाल मात्रा में आँकड़ों का विश्लेषण कर सकती है। लेकिन जिज्ञासा, सहानुभूति, कल्पनाशक्ति, अवलोकन, विवेक और सार्थक प्रश्न पूछने की क्षमता आज भी मानवीय क्षमताएँ हैं। इसलिए शिक्षा का उद्देश्य केवल बच्चों को तकनीक का उपयोग करना सिखाना नहीं होना चाहिए, बल्कि उन्हें ऐसी दुनिया में स्वतंत्र और विवेकपूर्ण ढंग से सोचने के लिए तैयार करना भी होना चाहिए, जहाँ तकनीक लगातार अधिक शक्तिशाली होती जा रही है।

जानकारी पाठ्यपुस्तकों से प्राप्त की जा सकती है, लेकिन बुद्धिमत्ता अनुभव से विकसित होती है—उन हाथों से जो कागज को नई संभावनाओं में मोड़ते हैं, उन पैरों से जो जिज्ञासा के साथ दुनिया को तलाशते हैं, उन आँखों से जो गहराई से देखना सीखती हैं, उन कहानियों से जो कॉमिक्स के माध्यम से सामने आती हैं और उन विचारों से जो कला, आत्मचिंतन और सार्थक संवादों के माध्यम से आकार लेते हैं।

माता-पिता, शिक्षकों और नीति-निर्माताओं के रूप में शायद अब समय आ गया है कि हम सफलता की अपनी परिभाषा को व्यापक बनाएं। जो बच्चा सार्थक प्रश्न पूछता है, दूसरों के साथ मिलकर रचनात्मक ढंग से काम करता है, सामान्य चीजों में भी सुंदरता देखता है और अपरिचित समस्याओं का सामना जिज्ञासा के साथ करता है, वह पहले से ही उन तरीकों से सफल हो रहा है जिन्हें कोई परीक्षा पूरी तरह माप नहीं सकती।

इसका अर्थ यह नहीं है कि परीक्षाएँ या शैक्षणिक उपलब्धियाँ महत्वपूर्ण नहीं हैं। उनका अपना स्थान है। प्रश्न यह है कि क्या उन्हें बच्चे की क्षमता का एकमात्र पैमाना बना दिया जाना चाहिए। एक स्वस्थ शिक्षा व्यवस्था को शैक्षणिक दक्षता के साथ-साथ रचनात्मकता, भावनात्मक समझ, सहयोग, संवाद, धैर्य और स्वतंत्र चिंतन को भी विकसित करना चाहिए।

शिक्षा का भविष्य अधिक टॉपर तैयार करने में नहीं, बल्कि अधिक विचारशील बच्चों को विकसित करने में है। हर कक्षा में केवल पाठ और पाठ्यपुस्तकें ही नहीं, बल्कि जिज्ञासा, रचनात्मकता, अन्वेषण और कल्पना की स्वतंत्रता भी होनी चाहिए।

शिक्षा का उद्देश्य केवल बच्चे को परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्नों के उत्तर देने के लिए तैयार करना नहीं होना चाहिए; बल्कि उसे दुनिया से बेहतर प्रश्न पूछने का साहस और जिज्ञासा देना चाहिए।

यही वह शिक्षा है जो बच्चों को केवल परीक्षा के लिए नहीं, बल्कि अर्थपूर्ण, रचनात्मक, जिम्मेदार और संभावनाओं से भरे जीवन के लिए तैयार करती है।