नामांकन पत्रों की जांच के बाद सामने आए आंकड़ों ने भाजपा और कांग्रेस दोनों को झटका दिया है। प्रदेश के करीब 20 जिलों के उपलब्ध आंकड़ों में दोनों दलों के 99 प्रत्याशियों के नामांकन खारिज हो गए हैं। पूरे प्रदेश में यह संख्या 200 से अधिक बताई जा रही है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार कांग्रेस के 57 और भाजपा के 42 प्रत्याशी चुनावी मैदान से बाहर हो गए हैं।
नामांकन खारिज होने के मामले में कांग्रेस को भाजपा की तुलना में अधिक नुकसान हुआ है। उपलब्ध आंकड़ों में कांग्रेस के 57 प्रत्याशियों के नामांकन निरस्त हुए, जबकि भाजपा के 42 प्रत्याशी मैदान से बाहर हो गए। यानी कांग्रेस को भाजपा के मुकाबले 15 अधिक नामांकन खारिज होने का नुकसान उठाना पड़ा।
कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा झटका अजमेर और पाली में लगा। अजमेर में कांग्रेस के 22 और पाली में 9 नामांकन खारिज हुए। इसके अलावा हनुमानगढ़ में 3, जबकि बीकानेर, टोंक, भीम और श्रीगंगानगर में 2-2 नामांकन निरस्त हुए।
सवाई माधोपुर, नागौर, करौली, शाहपुरा, कोटपूतली, सांगोद, खंडेला, सिरोही, देवगढ़, अलवर और जयपुर नगर निगम में भी कांग्रेस के प्रत्याशियों के नामांकन खारिज हुए हैं।
भाजपा के लिए भी नामांकन खारिज होने का सबसे बड़ा झटका अजमेर में लगा, जहां उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक पार्टी के 25 प्रत्याशियों के नामांकन निरस्त हुए हैं। इसके बाद दौसा और करौली में 3-3 तथा सवाई माधोपुर में 2 नामांकन खारिज हुए।
इसके अलावा नागौर, बीकानेर नगर निगम, टोंक, पाली, बूंदी, भीम, देवगढ़, श्रीगंगानगर और अलवर में भी भाजपा प्रत्याशियों के नामांकन निरस्त हुए हैं।
अजमेर में दोनों प्रमुख दलों के बड़ी संख्या में प्रत्याशियों के मैदान से बाहर होने से चुनावी समीकरण पर इसका सीधा असर पड़ सकता है।
दोनों दलों ने प्रत्याशियों के चयन से पहले उनकी राजनीतिक स्थिति और जीत की संभावनाओं को लेकर कई स्तर पर मंथन किया था। ऐसे में नामांकन पत्रों की जांच के दौरान बड़ी संख्या में प्रत्याशियों के बाहर होने से टिकट वितरण की प्रक्रिया के साथ-साथ दस्तावेजों की पहले से जांच को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
हालांकि नामांकन खारिज होने के पीछे अलग-अलग तकनीकी, दस्तावेजी और कानूनी कारण हो सकते हैं। इसलिए हर मामले को एक ही नजरिए से देखना उचित नहीं होगा।
अलवर में कांग्रेस के वार्ड 58 प्रत्याशी हेमंत कुमार का नामांकन आपराधिक रिकॉर्ड से जुड़े कारणों के चलते खारिज होने की जानकारी सामने आई है। वहीं भाजपा की पूर्व कार्यवाहक सभापति शकुंतला सोनी का नामांकन भी निरस्त हुआ है।
दोनों प्रमुख दलों के प्रत्याशियों के नामांकन खारिज होने से संबंधित वार्डों में अब मुकाबले का गणित बदल गया है। जहां किसी पार्टी का प्रत्याशी मजबूत माना जा रहा था, वहां अब निर्दलीय या दूसरे दल के उम्मीदवारों के लिए संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
नामांकन खारिज होने के बाद अब भाजपा और कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती संबंधित वार्डों में नए सिरे से चुनावी रणनीति तैयार करने की है। कई जगह पार्टी प्रत्याशी के मैदान से बाहर होने पर उसके समर्थक निर्दलीय उम्मीदवारों की ओर जा सकते हैं।
ऐसे में टिकट से वंचित दावेदारों और बागियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है। दोनों दलों को अब केवल अधिकृत प्रत्याशियों के प्रचार पर ही नहीं, बल्कि असंतुष्ट कार्यकर्ताओं को साधने पर भी जोर देना होगा।
कुल मिलाकर, राजस्थान निकाय चुनाव में नामांकन जांच के बाद भाजपा और कांग्रेस की चुनावी रणनीति को बड़ा झटका लगा है। टिकट तय करने के लिए कई दौर की कवायद के बावजूद बड़ी संख्या में नामांकन खारिज होना दोनों दलों के लिए सबक भी है और अब नए चुनावी समीकरण साधने की चुनौती भी।