पूर्व कैबिनेट मंत्री हेम सिंह भड़ाना का 59 साल की उम्र में निधन हो गया। हेम सिंह अलवर जिले के अकेले ऐसे छात्रसंघ अध्यक्ष रहे, जो कैबिनेट मंत्री बने। वे छात्र राजनीति से ही अपनी अलग छवि बना चुके थे।
छात्र राजनीति से निकलने के बाद भड़ाना ने 2005 में किशनगढ़ बास से प्रधान का चुनाव जीता। इसके बाद गुर्जर आरक्षण आंदोलन के दौरान प्रधान रहते हुए 2006 में जेल गए। 2013-18 में वसुंधरा राजे सरकार के समय गुर्जर आरक्षण आंदोलन के दौरान वसुंधरा सरकार में हेम सिंह मंत्री थे। सरकार और गुर्जरों के बीच वार्ता में अहम भूमिका निभाई थी।
अलवर के बाबू शोभाराम राजकीय कला कॉलेज में राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा की साली प्रिंसिपल थीं। 20 साल के हेम सिंह भड़ाना प्रिंसिपल के गनमैन को हटाकर सीधे उनके चैंबर में चले जाते थे।
वे छात्रों के हितों के लिए प्रिंसिपल से भिड़ जाते, जबकि प्रिंसिपल के एक फोन पर पुलिस पहुंच जाती। लेकिन हेम सिंह छात्रों की मांग पूरी होने तक अपनी आवाज बुलंद रखते थे। हेम सिंह भड़ाना के कॉलेज में जूनियर रहे पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष नरेंद्र मीणा ने कहा- बाबू शोभाराम राजकीय कला कॉलेज में पूर्व राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा की साली क्षमा शर्मा प्रिंसिपल थीं। कॉलेज में राष्ट्रपति की साली होने के कारण हमेशा हथियारबंद जवान तैनात रहते थे।
लेकिन हेम सिंह, उस समय सिर्फ 20 साल के थे, गनमैन को हटाकर प्रिंसिपल के चैंबर में घुसे जाते थे। प्रिंसिपल एक फोन करतीं और पुलिस हाजिर, लेकिन हेम सिंह कहां डरने वाले थे। जब तक छात्रों की मांगें पूरी नहीं हो जातीं, वे अपनी आवाज बुलंद रखते थे।
हालांकि जब मांगें पूरी हो जातीं, तो हेम सिंह खुद प्रिंसिपल से मिलने जाते और अपनी छोटी-मोटी गलतियों के लिए माफी भी मांग लेते थे। ये बात और है कि शुरुआत में उन्हें छात्रसंघ अध्यक्ष के 2 चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था, लेकिन 1992 में उन्होंने आखिरकार जीत हासिल की और छात्रसंघ अध्यक्ष बने। नरेंद्र मीणा बताया- हेम सिंह अपने अलग अंदाज के लिए जाने जाते थे। वे हमेशा छात्रों के ग्रुप के साथ कॉलेज आते थे। 2 चुनाव हारने के बाद भी, उनका प्रेम और समर्पण कम नहीं हुआ। वे उतने ही उत्साह से दूसरे छात्रों के काम करते थे। 1992 में अध्यक्ष बने, और यहीं से उनकी राजनीति आगे बढ़ी।
हेम सिंह जुबान के पक्के थे। वे हमेशा अपने वादे के अनुसार काम करते थे, चाहे उन्हें कितनी भी मुश्किलों का सामना करना पड़े। जिसका साथ देते थे, उसका खुलकर नेतृत्व करते थे।
अगर किसी और ने बाद में मदद मांगी, तो वे साफ कह देते थे कि पहले ही किसी और को वादा कर चुके हैं। छात्र राजनीति में बहुत दबाव होता था, लेकिन हेम सिंह हमेशा अपनी बात पर अड़े रहते थे। बाबू शोभाराम राजकीय कॉलेज में हेम सिंह अपनी जीप लेकर आते थे। उमरैण के प्रधान रहे प्रेम पटेल ने बताया- हेम सिंह जैसा दिलदार कोई नहीं था। वे हमेशा मन की बात खुलकर कहते थे और जनता से किए वादे को निभाने के लिए किसी भी मंच पर बात रखने से नहीं हिचकिचाते थे।
2019 में सरिस्का से गांवों के विस्थापन को लेकर क्रास्का के ग्रामीणों ने विरोध किया, तो हेम सिंह ने वन अधिकारियों को साफ कह दिया कि वे गांव वालों को परेशान नहीं होने देंगे। गांव पहले बसे थे या जंगल? जंगल में गांव वालों की कई पीढ़ियां बीत गई हैं।
अब उन्हें सम्मान के साथ भेजा जाना चाहिए और उनकी मांगें पूरी होनी चाहिए। एक बार चुनाव के समय गांव में बूथ कैप्चरिंग हुई, तो वे खुद वहां पहुंच गए और गांव वालों से बात की। मतलब, वे हर तरह के माहौल में चले जाने की हिम्मत रखते थे।