Rajasthan

कमला बेनीवाल समेत 17 आरोपियों को बड़ी राहत: राजस्थान हाईकोर्ट ने सरकारी जमीन हड़पने के मामले में आपराधिक कार्यवाही रद्द की

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने गुजरात की पूर्व राज्यपाल दिवंगत कमला बेनीवाल समेत 17 आरोपियों को सरकारी जमीन हड़पने के मामले में बड़ी राहत दी है। जस्टिस गणेश राम मीणा की बेंच ने मामले में ट्रायल कोर्ट में चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के प्रसंज्ञान आदेश के साथ ही एडीजे कोर्ट की ओर से जारी रिवीजन आदेश को भी निरस्त कर दिया।

अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि जब किसी संपत्ति या जमीन से जुड़ा विवाद पहले से सिविल और राजस्व अदालतों में विचाराधीन हो, तो उसे आपराधिक मामले का रूप नहीं दिया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि इस मामले का मूल विवाद कृषि भूमि के पट्टे, स्वामित्व और खातेदारी अधिकारों से जुड़ा है। ये सभी मुद्दे मूल रूप से सिविल और राजस्व प्रकृति के हैं।

हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे विवाद को आपराधिक रंग देना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जाएगा। अदालत ने यह भी माना कि संबंधित जमीन के अधिकारों को लेकर अलग-अलग कानूनी मंचों पर मामले अभी लंबित हैं।

खातेदारी अधिकार से लेकर मुआवजे तक कई मामले लंबित

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि विवादित जमीन से संबंधित कई महत्वपूर्ण मुद्दे अभी भी अलग-अलग न्यायिक और राजस्व मंचों के सामने विचाराधीन हैं।

इनमें वर्ष 1958 में दिए गए खातेदारी अधिकार, जयपुर विकास प्राधिकरण यानी JDA की ओर से जमीन का अधिग्रहण, भू-राजस्व कानून के तहत रेफरेंस और अधिग्रहण के बदले मुआवजे के वितरण जैसे मामले शामिल हैं।

अदालत के अनुसार जब तक सक्षम सिविल या राजस्व अदालतें संबंधित खातेदारी और दूसरे अधिकारों को रद्द नहीं करतीं, तब तक केवल इन अधिकारों के आधार पर धोखाधड़ी या फर्जीवाड़े का आपराधिक आरोप कायम नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने माना कि जमीन पर अधिकार को लेकर मूल विवाद का फैसला सिविल और राजस्व अदालतों को करना है। यदि किसी पक्ष के जमीन पर अधिकार को लेकर विवाद है तो पहले संबंधित सक्षम अदालत से उस अधिकार का निर्धारण कराया जाना जरूरी है।

करीब 14 साल पहले दर्ज हुई थी शिकायत

इस मामले की शुरुआत करीब 14 साल पहले हुई थी। शिकायतकर्ता संजय किशोर अग्रवाल ने 16 अगस्त 2012 को अदालत में शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में सरकारी जमीन के आवंटन और बाद में खातेदारी अधिकार हासिल करने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए थे।

शिकायत के अनुसार वर्ष 1951 में तत्कालीन सरकार ने अनुपयोगी कृषि भूमि को सीमित अवधि के लिए खेती के उद्देश्य से आवंटित करने की योजना शुरू की थी। इसके तहत शुरुआत में जमीन 20 साल के लिए खेती करने के लिए दी जानी थी। बाद में नियमों में संशोधन कर इस अवधि को बढ़ाकर 25 साल कर दिया गया था।

शिकायत में दावा किया गया था कि निर्धारित 25 साल की अवधि पूरी होने के बाद जमीन वापस राज्य सरकार के पास चली जानी थी।

1953 में सहकारी समिति को हुआ जमीन का आवंटन

शिकायत के अनुसार सरकार ने 5 जनवरी 1953 को राजेंद्र सिंह और अन्य लोगों की किसान सामूहिक कृषि सहकारी समिति, झोटवाड़ा को जमीन आवंटित की थी।

शिकायतकर्ता का आरोप था कि जिस सहकारी समिति को जमीन आवंटित की गई थी, उसका पंजीकरण 13 फरवरी 1953 को हुआ। यानी जमीन के आवंटन की तारीख और समिति के पंजीकरण की तारीख में अंतर था।

शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया कि समिति के सदस्यों ने बाद में कृषि कार्य करने के बजाय दूसरे काम शुरू कर दिए। इसके बावजूद गलत तथ्यों के आधार पर उन्होंने जमीन पर खातेदारी अधिकार हासिल कर लिए।

आरोप था कि निर्धारित 25 वर्ष की अवधि पूरी होने के बाद भी सरकार ने जमीन वापस नहीं ली और बाद में इस जमीन से जुड़े अधिकारों को लेकर विवाद खड़ा हो गया।

JDA ने पृथ्वीराज नगर योजना के लिए जमीन अवाप्त की

मामले में आगे जमीन का विवाद जयपुर विकास प्राधिकरण से भी जुड़ गया। कुछ वर्षों बाद JDA ने पृथ्वीराज नगर योजना के लिए संबंधित जमीन के अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू की।

जमीन अधिग्रहण के लिए अधिसूचना जारी की गई। इसके बाद समिति के सदस्यों को अधिग्रहित जमीन के बदले मुआवजे के रूप में विकसित जमीन देने का प्रस्ताव दिया गया।

बताया गया कि जमीन मालिकों या खातेदारों को मुआवजे के तौर पर 15 फीसदी विकसित जमीन देने का ऑफर किया गया था। इसी प्रक्रिया में जमीन के स्वामित्व, खातेदारी और अधिग्रहण से जुड़े अधिकारों को लेकर विवाद और गहरा गया।

बाद में इन्हीं मुद्दों को लेकर विभिन्न राजस्व और न्यायिक मंचों पर मामले चलते रहे।

हाईकोर्ट ने आपराधिक केस को माना प्रक्रिया का दुरुपयोग

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि जमीन के अधिकार और मुआवजे से जुड़े मूल विवाद पहले से ही सिविल और राजस्व मंचों पर लंबित हैं। ऐसे में उसी विवाद को आधार बनाकर आपराधिक कार्यवाही चलाना उचित नहीं है।

जस्टिस गणेश राम मीणा की बेंच ने कहा कि आपराधिक कानून का इस्तेमाल ऐसे सिविल और राजस्व विवादों को दबाव बनाने के लिए नहीं किया जा सकता, जिनका समाधान सक्षम सिविल या राजस्व अदालतों में होना है।

अदालत ने इसी आधार पर ट्रायल कोर्ट की ओर से लिए गए प्रसंज्ञान को रद्द कर दिया। साथ ही एडीजे कोर्ट के रिवीजन आदेश को भी निरस्त कर दिया।

इस फैसले से दिवंगत कमला बेनीवाल समेत सभी 17 याचिकाकर्ताओं को बड़ी राहत मिली है। हालांकि जमीन के मूल स्वामित्व, खातेदारी अधिकार, अधिग्रहण और मुआवजे से जुड़े विवादों का अंतिम निर्णय संबंधित सिविल और राजस्व अदालतों में ही होगा।

हाईकोर्ट का यह फैसला इस सिद्धांत को भी रेखांकित करता है कि किसी जमीन या संपत्ति के मूल अधिकार को लेकर चल रहे सिविल विवाद को महज आरोपों के आधार पर आपराधिक मुकदमे में नहीं बदला जा सकता। पहले सक्षम अदालत को संपत्ति से जुड़े अधिकारों का निर्धारण करना होगा और उसके बाद ही किसी आपराधिक कृत्य का सवाल उठ सकता है।