परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक ने मीडिया से बातचीत के दौरान बताया कि सरकार का मकसद किसी का रोजगार छीनना नहीं, बल्कि यात्रियों से संवाद के लिए स्थानीय भाषा को बढ़ावा देना है:
नोटिस और अवसर: अभियान के दौरान जिन ड्राइवरों को मराठी नहीं आएगी, उन्हें सबसे पहले नोटिस दिया जाएगा और भाषा सीखने के लिए 3 महीने का समय दिया जाएगा।
सस्पेंशन और रद्दीकरण: यदि नोटिस के बाद भी ड्राइवर मराठी का कामचलाऊ ज्ञान हासिल करने में असमर्थ रहते हैं, तो उनके ड्राइविंग लाइसेंस और बैज को सस्पेंड कर दिया जाएगा। इसके बाद भी नियम न मानने पर लाइसेंस पूरी तरह रद्द कर दिया जाएगा।
इस अभियान को पारदर्शी और असरदार बनाने के लिए परिवहन विभाग ने विशेष इंतजाम किए हैं:
फ्लाइंग स्क्वॉड की तैनाती: अतिरिक्त परिवहन आयुक्त रवि गायकवाड़ पूरे महाराष्ट्र में इस एक महीने के अभियान की निगरानी करेंगे।
RTO की जांच: क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय (RTO) की फ्लाइंग स्क्वॉड टीमें सड़कों पर ऑटो-टैक्सी ड्राइवरों का वेरिफिकेशन करेंगी।
वीडियो रिकॉर्डिंग: किसी भी प्रकार के विवाद या भ्रष्टाचार से बचने के लिए जांच प्रक्रिया की पूरी वीडियो रिकॉर्डिंग भी की जाएगी।
सरकार के इस फैसले पर 'सेवा सारथी ऑटो-रिक्शा टैक्सी एंड ट्रांसपोर्ट यूनियन' के नेता डीएम गोसावी ने प्रतिक्रिया दी है:
स्पष्टता की मांग: यूनियन का कहना है कि सरकार ने मराठी का 'वर्किंग नॉलेज' होना अनिवार्य कर दिया है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया कि इसके लिए कितनी मराठी जानना जरूरी होगा।
शोषण का डर: नियम अस्पष्ट होने के कारण आरटीओ अधिकारियों द्वारा ड्राइवरों के आर्थिक शोषण और भ्रष्टाचार की आशंका जताई जा रही है।
महाराष्ट्र (विशेष रूप से मुंबई और एमएमआर क्षेत्र) में बड़ी संख्या में ऑटो और टैक्सी चालक उत्तर प्रदेश, बिहार और अन्य राज्यों से आते हैं:
रोजी-रोटी का संकट: कई चालक या तो बहुत कम मराठी बोल पाते हैं या उन्हें मराठी नहीं आती है।
परमिट रद्द होने का डर: नए नियमों के लागू होने के बाद हजारों गैर-मराठी ड्राइवरों के बीच अपने परमिट और लाइसेंस गंवाने का डर सताने लगा है।