दिलावर ने कहा कि नाबालिग छात्रों की फोटो, वीडियो या बयान लेने से पहले उनके अभिभावकों की अनुमति आवश्यक होगी। यदि अभिभावक मौके पर मौजूद नहीं हैं, तो संबंधित शिक्षक से अनुमति ली जा सकती है, क्योंकि स्कूल परिसर में शिक्षक बच्चों के अभिभावक की भूमिका निभाते हैं।
शिक्षा मंत्री ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को बिना किसी उद्देश्य के स्कूल में प्रवेश कर बच्चों से बातचीत करने या उनका इंटरव्यू लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती। इससे विद्यार्थियों की निजता प्रभावित हो सकती है। उन्होंने बताया कि बच्चों के अधिकारों और उनकी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए संस्था प्रधानों को आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं।
उन्होंने कहा कि यदि किसी मीडिया प्रतिनिधि या अन्य व्यक्ति को किसी विशेष मामले में बच्चों से बातचीत करनी है या रिकॉर्डिंग करनी है, तो उसे पहले संस्था प्रधान से अनुमति लेनी होगी। सरकार मीडिया की स्वतंत्रता का सम्मान करती है, लेकिन बच्चों की सुरक्षा और अधिकारों से किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा।
दिलावर ने कहा कि सरकारी स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा और उनकी समस्याओं को लेकर लगातार निगरानी रखी जाती है। अभिभावकों और शिक्षकों की नियमित बैठकों में स्कूलों की व्यवस्थाओं और बच्चों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होती रहती है। ऐसे में स्कूलों के हालात किसी से छिपे हुए नहीं हैं।
उन्होंने कहा कि किसी भी व्यक्ति का कभी भी स्कूल परिसर में आकर अपनी मर्जी से गतिविधियां करना उचित नहीं है। नाबालिग बच्चों की फोटो, वीडियो या बयान सार्वजनिक करने से पहले उनकी सुरक्षा, निजता और अधिकारों का विशेष ध्यान रखना जरूरी है।
वहीं इस मुद्दे पर CJP के राष्ट्रीय प्रवक्ता आशुतोष रांका ने सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि सरकार को पहले राजस्थान के सभी जर्जर सरकारी स्कूलों की स्थिति सुधारनी चाहिए। रांका ने तंज कसते हुए कहा कि यदि स्कूलों की वास्तविक स्थिति दिखाना गलत है तो सरकार उनके खिलाफ पहले से ही एफआईआर दर्ज करवा दे।
सरकारी स्कूलों में मीडिया की भूमिका और बच्चों की निजता को लेकर शुरू हुआ यह विवाद अब राजनीतिक रंग भी लेने लगा है। हालांकि शिक्षा मंत्री ने साफ कर दिया है कि सरकार का उद्देश्य मीडिया पर रोक लगाना नहीं, बल्कि छात्रों के हितों और अधिकारों की रक्षा करना है।