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मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा न मिलने पर बवाल, कांग्रेस का केंद्र पर हमला; आदिवासी आंदोलन की चेतावनी

मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा नहीं मिलने पर बढ़ा विवाद, कांग्रेस ने केंद्र सरकार पर साधा निशाना

राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में स्थित ऐतिहासिक मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा देने के मुद्दे पर राजनीतिक विवाद गहरा गया है। केंद्र सरकार की ओर से संसद में दिए गए जवाब के बाद वागड़ अंचल में नाराजगी देखने को मिल रही है। कांग्रेस नेताओं ने सरकार पर आदिवासी समाज से किए गए वादे को पूरा नहीं करने का आरोप लगाया है, जबकि इस मुद्दे को लेकर आदिवासी क्षेत्रों में भी चर्चा तेज हो गई है।

डूंगरपुर कांग्रेस जिलाध्यक्ष गणेश घोघरा ने एक वीडियो संदेश जारी कर केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर वादाखिलाफी का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि संसद में मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने को लेकर पूछे गए प्रश्न के जवाब में केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने बताया कि फिलहाल इस संबंध में कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है। घोघरा का कहना है कि यह जवाब उन उम्मीदों के विपरीत है, जो 2022 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मानगढ़ धाम दौरे के दौरान बनी थीं।

घोघरा ने कहा कि प्रधानमंत्री ने मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने और इसके महत्व को देश के सामने रखने की बात कही थी। ऐसे में संसद में सरकार का यह रुख आदिवासी समाज की भावनाओं को आहत करने वाला है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार अब अपने ही पुराने आश्वासनों से पीछे हटती दिखाई दे रही है।

आदिवासी इतिहास का प्रतीक है मानगढ़ धाम

मानगढ़ धाम राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के आदिवासी समुदायों की आस्था और इतिहास से जुड़ा महत्वपूर्ण स्थल माना जाता है। यह स्थान महान समाज सुधारक और आदिवासी नेता Govind Guru के आंदोलन से जुड़ा हुआ है।

इतिहासकारों के अनुसार 17 नवंबर 1913 को मानगढ़ पहाड़ी पर बड़ी संख्या में आदिवासी एकत्रित थे। उस दौरान ब्रिटिश शासन और रियासती सेनाओं की कार्रवाई में बड़ी संख्या में भील आदिवासियों की मौत हुई थी। आदिवासी समाज इस घटना को अपने इतिहास की महत्वपूर्ण शहादतों में गिनता है। कई लोग इसे "आदिवासी जलियांवाला बाग" के रूप में भी याद करते हैं।

गणेश घोघरा ने दावा किया कि उस घटना में करीब 1500 भील आदिवासियों ने बलिदान दिया था। उन्होंने कहा कि मानगढ़ धाम केवल एक धार्मिक या सांस्कृतिक स्थल नहीं, बल्कि आदिवासी समाज के संघर्ष, स्वाभिमान और बलिदान का प्रतीक है। इसलिए इसे राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा मिलना चाहिए।

सरकार पर इतिहास की अनदेखी का आरोप

कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि सरकार आदिवासी इतिहास और उनके योगदान को पर्याप्त महत्व नहीं दे रही है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज ने स्वतंत्रता आंदोलन और सामाजिक सुधार आंदोलनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन उनके योगदान को अपेक्षित स्थान नहीं मिल पा रहा है।

घोघरा ने यह भी आरोप लगाया कि आदिवासी नायकों और ऐतिहासिक घटनाओं को शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में पर्याप्त जगह नहीं दी जा रही है। उनके अनुसार, मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा देने से आदिवासी इतिहास को राष्ट्रीय पहचान मिलेगी और आने वाली पीढ़ियां इस गौरवशाली विरासत के बारे में जान सकेंगी।

आंदोलन की चेतावनी

कांग्रेस जिलाध्यक्ष ने केंद्र सरकार से संसद में दिए गए जवाब पर पुनर्विचार करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि सरकार को जल्द से जल्द मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने की दिशा में कदम उठाने चाहिए।

घोघरा ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि आदिवासी समाज की भावनाओं और ऐतिहासिक विरासत की अनदेखी जारी रही तो देशभर में आंदोलन शुरू किया जाएगा। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज अपने सम्मान और इतिहास की रक्षा के लिए लोकतांत्रिक तरीके से संघर्ष करने को तैयार है।

राजनीतिक महत्व भी बढ़ा

मानगढ़ धाम का मुद्दा केवल सांस्कृतिक और ऐतिहासिक नहीं, बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है। राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के आदिवासी क्षेत्रों में इसका विशेष प्रभाव है। ऐसे में इस मुद्दे पर विभिन्न राजनीतिक दल अपनी-अपनी स्थिति स्पष्ट कर रहे हैं।

कांग्रेस जहां केंद्र सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप लगा रही है, वहीं सरकार की ओर से अभी तक इस मुद्दे पर कोई नया बयान सामने नहीं आया है। हालांकि संसद में दिए गए जवाब के बाद यह मामला राजनीतिक बहस का विषय बन गया है।

मानगढ़ धाम का बढ़ता महत्व

पिछले कुछ वर्षों में मानगढ़ धाम राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का केंद्र बना है। यहां स्मारक विकास, पर्यटन सुविधाओं और ऐतिहासिक संरक्षण को लेकर विभिन्न योजनाएं भी शुरू की गई हैं। आदिवासी समाज लंबे समय से मांग करता रहा है कि इस स्थल को राष्ट्रीय स्मारक घोषित कर विशेष संरक्षण दिया जाए।

अब केंद्र सरकार के जवाब के बाद यह मांग एक बार फिर चर्चा में है। आने वाले समय में सरकार इस विषय पर क्या रुख अपनाती है और आदिवासी संगठनों की प्रतिक्रिया क्या रहती है, इस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।