खड़गे के इस बयान पर सत्ता पक्ष ने कड़ी आपत्ति जताई। केंद्रीय मंत्री और भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा कि यह टिप्पणी तथ्यों से परे है और इससे समाज में भ्रम तथा अशांति फैल सकती है। विवाद बढ़ने पर राज्यसभा के सभापति सी.पी. राधाकृष्णन ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि मनुस्मृति से संबंधित विवादित टिप्पणी को सदन की कार्यवाही से हटा दिया जाएगा।
यह पूरा विवाद उस समय सामने आया जब राज्यसभा में पेपर लीक और परीक्षा में नकल रोकने से संबंधित संशोधन विधेयक पर बहस चल रही थी। इससे पहले केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने सदन में विधेयक पेश किया। एक दिन पहले लोकसभा में इस बिल पर करीब सात घंटे तक चर्चा हुई थी, जिसके बाद इसे पारित कर दिया गया था।
सरकार का दावा है कि यह कानून प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक, नकल और अन्य अनियमितताओं पर सख्त रोक लगाने के लिए लाया गया है। वहीं विपक्ष ने कानून के प्रावधानों के साथ-साथ शिक्षा व्यवस्था और भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता के मुद्दे भी उठाए।
बहस के दौरान खड़गे ने कुछ ऐतिहासिक संदर्भों का उल्लेख करते हुए दावा किया कि प्राचीन ग्रंथों में शूद्रों के लिए कठोर दंड का उल्लेख मिलता है। इस पर भाजपा सांसदों ने उनकी बात का विरोध किया और कहा कि जिन दंडों का उल्लेख किया गया, वे मूल मनुस्मृति में नहीं हैं।
बाद में यह तथ्य सामने आया कि जिन सजाओं का उल्लेख किया गया, वे मुख्य रूप से ‘गौतम धर्मसूत्र’ के कुछ श्लोकों में वर्णित हैं। खड़गे ने भी बाद में स्पष्ट किया कि उनका संदर्भ गौतम ऋषि के ग्रंथों से था।
भाजपा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने बहस में हिस्सा लेते हुए कहा कि मनुस्मृति के वर्तमान संस्करणों और उनके ऐतिहासिक स्रोतों को लेकर कई प्रश्न हैं। उन्होंने कहा कि ब्रिटिश विद्वान और न्यायाधीश सर विलियम जोन्स ने 18वीं सदी के अंत में मनुस्मृति का अंग्रेजी अनुवाद किया था।
त्रिवेदी ने कहा कि आधुनिक अनुसूचित जातियों और वैदिक काल के शूद्रों को एक समान मानना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं है। उन्होंने दावा किया कि उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोतों के आधार पर इस विषय पर अधिक प्रमाणों की आवश्यकता है।
इतिहासकारों के अनुसार, विलियम जोन्स ने मनुस्मृति का पहला प्रसिद्ध अंग्रेजी अनुवाद 1794 में “Institutes of Hindu Law, or the Ordinances of Menu” शीर्षक से प्रकाशित किया था। यह पुस्तक आज भी सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध है और विभिन्न डिजिटल पुस्तकालयों में पढ़ी जा सकती है।
हालांकि इतिहास विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि मनुस्मृति की संस्कृत पांडुलिपियां और उनके विभिन्न संस्करण विलियम जोन्स के अनुवाद से पहले भी अस्तित्व में थे। जोन्स का कार्य मुख्य रूप से इन ग्रंथों को अंग्रेजी पाठकों तक पहुंचाने का माध्यम बना।
सुधांशु त्रिवेदी ने बहस के दौरान डॉ. भीमराव अंबेडकर की प्रसिद्ध पुस्तक “Who Were the Shudras?” का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि अंबेडकर ने आधुनिक अनुसूचित जातियों और वैदिक काल के शूद्रों के बीच सीधा संबंध नहीं बताया था।
पुस्तक में अंबेडकर ने तर्क दिया था कि प्राचीन शूद्र मूल रूप से क्षत्रिय समुदाय का हिस्सा थे, लेकिन सामाजिक और धार्मिक संघर्षों के कारण उन्हें उपनयन संस्कार से वंचित कर दिया गया और धीरे-धीरे वे चौथे वर्ण में शामिल हो गए। अंबेडकर ने यह भी लिखा कि प्राचीन शूद्रों और आधुनिक अनुसूचित जातियों को एक ही वर्ग मानना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं होगा।
कांग्रेस सांसद प्रमोद तिवारी ने बहस के दौरान एक पुस्तक दिखाते हुए सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि यदि संबंधित पुस्तकें और सामग्री आज भी प्रकाशित हो रही हैं और उन पर कोई प्रतिबंध नहीं है, तो उनकी सामग्री को लेकर उठ रहे सवालों की जिम्मेदारी भी सरकार से जुड़ती है। उन्होंने तर्क दिया कि केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार पिछले 12 वर्षों से सत्ता में है, इसलिए केवल विपक्ष पर आरोप लगाना उचित नहीं है।
राज्यसभा में हुई यह बहस एक बार फिर इस बात का उदाहरण बन गई कि शिक्षा, इतिहास और सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दे संसद में किस तरह व्यापक राजनीतिक विमर्श का विषय बन जाते हैं। पेपर लीक रोकने के उद्देश्य से लाए गए विधेयक पर चर्चा के दौरान शुरू हुई बहस इतिहास, धर्मग्रंथों और सामाजिक संरचना तक पहुंच गई। हालांकि सदन की कार्यवाही आगे बढ़ी, लेकिन खड़गे के ‘मनुस्मृति’ संबंधी बयान को लेकर शुरू हुआ विवाद दिनभर राजनीतिक चर्चाओं का केंद्र बना रहा।