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क्षितिज पर एक नया राष्ट्र? बलूचिस्तान की स्वतंत्रता घोषणा और दक्षिण एशिया की भू-राजनीति

क्षितिज पर एक नया राष्ट्र? बलूचिस्तान की स्वतंत्रता घोषणा और दक्षिण एशिया की भू-राजनीति लेखक: कर्नल (डॉ.) देव आनंद लोहमरोड़ रक्षा एवं अंतरराष्ट्रीय मामलों के विश्लेषक

बलूचिस्तान का प्रश्न अब एक नए और संभावित रूप से निर्णायक चरण में प्रवेश कर चुका है। जब बलूच राष्ट्रवादी संगठन 11 अगस्त 2026 को बलूचिस्तान स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाने की तैयारी कर रहे हैं, तब स्वतंत्र एवं संप्रभु बलूचिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मान्यता देने की उनकी मांग दक्षिण एशिया के सबसे लंबे समय से चले आ रहे क्षेत्रीय और राजनीतिक विवादों में से एक को फिर केंद्र में ले आई है। जो प्रश्न अब तक मुख्यतः पाकिस्तान के आंतरिक विद्रोह और सुरक्षा समस्या के रूप में देखा जाता था, वह अब पाकिस्तान की क्षेत्रीय अखंडता, चीन के रणनीतिक निवेश, अरब सागर की सुरक्षा, क्षेत्रीय संपर्क मार्गों और भारत के रणनीतिक हितों से जुड़ा व्यापक भू-राजनीतिक मुद्दा बनता जा रहा है।

इस विवाद की ऐतिहासिक जड़ें ब्रिटिश शासन के अंतिम दौर तक जाती हैं। वर्तमान बलूचिस्तान का सबसे बड़ा रियासती क्षेत्र कलात खानत था, जिसने 11 अगस्त 1947 को अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की थी। पाकिस्तान के गठन के बाद भी कई महीनों तक बातचीत चलती रही और अंततः कलात के खान मीर अहमद यार खान ने 27 मार्च 1948 को पाकिस्तान के साथ विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए। आज भी मूल विवाद यही है कि यह विलय वास्तविक संवैधानिक सहमति का परिणाम था अथवा राजनीतिक और सैन्य दबाव में कराया गया था। पाकिस्तान इसे वैध विलय मानता है, जबकि बलूच राष्ट्रवादी इतिहासकार और राजनीतिक संगठन लंबे समय से इस व्याख्या को चुनौती देते रहे हैं।

एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि कलात भारत में विलय करना चाहता था, लेकिन नई दिल्ली ने भौगोलिक परिस्थितियों के कारण इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था। इस दावे के समर्थन में निर्णायक दस्तावेजी प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। 30 मार्च 1948 को संसद में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने स्पष्ट रूप से उन रिपोर्टों का खंडन किया था जिनमें कहा गया था कि कलात ने भारत में विलय का प्रस्ताव दिया था। उन्होंने कहा था कि कलात ने भारत सरकार से राजनयिक मान्यता और दिल्ली में व्यापारिक एजेंसी स्थापित करने की अनुमति मांगी थी, लेकिन भारत में विलय का कोई प्रस्ताव नहीं दिया गया था।

हालांकि विलय के साथ विवाद समाप्त नहीं हुआ। इसके तुरंत बाद सशस्त्र प्रतिरोध शुरू हुआ, जिसका नेतृत्व कलात के खान के छोटे भाई प्रिंस अब्दुल करीम ने किया। इसके बाद 1958, 1962, 1973 और विशेष रूप से 2000 के दशक की शुरुआत से बलूचिस्तान में कई विद्रोह हुए। बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) और बलूच लिबरेशन फ्रंट (बीएलएफ) जैसे संगठनों ने पाकिस्तानी सुरक्षा बलों, सरकारी प्रतिष्ठानों, आधारभूत संरचनाओं और चीनी हितों को निशाना बनाया है। पाकिस्तान इन संगठनों को आतंकवादी संगठन मानता है, जबकि बलूच अलगाववादी इन्हें स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा बताते हैं।

हाल के वर्षों में इस विद्रोह को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अधिक ध्यान मिला है। मार्च 2025 में जाफर एक्सप्रेस ट्रेन पर हुआ हमला, जिसकी जिम्मेदारी बीएलए ने ली थी, ने यह दिखाया कि विद्रोही संगठन महत्वपूर्ण परिवहन ढांचे को निशाना बनाने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित करने की क्षमता रखते हैं। चीनी नागरिकों और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे से जुड़ी परियोजनाओं पर लगातार हो रहे हमलों ने बलूचिस्तान को पाकिस्तान की घरेलू सुरक्षा समस्या से आगे बढ़ाकर अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक चिंता का विषय बना दिया है।

एक विशेष रूप से महत्वपूर्ण घटनाक्रम 13 जुलाई 2026 को सामने आया, जब स्वयंभू बलूच राष्ट्रवादी नेता मीर यार बलूच के नाम से जारी एक बयान में तथाकथित “रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान” की स्थापना की घोषणा की गई। इस घोषणा में एक राष्ट्रीय ध्वज, “मा चुकेन बलूचानी” नामक राष्ट्रीय गान और प्रस्तावित राष्ट्रीय मुद्रा “बलूची फलूस” अपनाने की बात कही गई। साथ ही एक नए प्रशासनिक ढांचे की स्थापना का दावा किया गया। बलूचिस्तान के बड़े हिस्से पर नियंत्रण का दावा भी किया गया, हालांकि इन क्षेत्रीय नियंत्रण संबंधी दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है। पाकिस्तान ने इस घोषणा को खारिज कर दिया है।

फिर भी इस घटनाक्रम के राजनीतिक महत्व को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ध्वज, राष्ट्रीय गान, मुद्रा और प्रशासनिक संस्थाओं को अपनाने अथवा अपनाने का दावा, बलूच आंदोलन को केवल सशस्त्र विद्रोह की भाषा से आगे ले जाकर राज्य निर्माण की भाषा में प्रस्तुत करने का प्रयास है। यह स्वयं को एक “भावी राष्ट्र” या “स्टेट इन वेटिंग” के रूप में स्थापित करने की कोशिश है। 11 अगस्त को विश्व स्तर पर स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाने का आह्वान इस रणनीति को और राजनीतिक आयाम देता है। अब प्रश्न यह है कि क्या यह प्रतीकात्मक पहल आगे चलकर राजनीतिक वैधता, प्रभावी शासन और अंतरराष्ट्रीय मान्यता में बदल सकती है।

बलूचिस्तान का रणनीतिक महत्व इस प्रश्न को और अधिक गंभीर बनाता है। यह प्रांत पाकिस्तान के कुल भू-भाग का लगभग 44 प्रतिशत है और क्षेत्रफल की दृष्टि से पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है। यहां प्राकृतिक गैस, तांबा, सोना और अन्य खनिजों के महत्वपूर्ण भंडार हैं। इसके अलावा अरब सागर से लगी इसकी लंबी तटरेखा इसे असाधारण समुद्री रणनीतिक महत्व देती है। इसी क्षेत्र में ग्वादर बंदरगाह स्थित है, जो चीन के बड़े निवेश से विकसित हुआ है और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

चीन के लिए बलूचिस्तान इसलिए केवल पाकिस्तान का एक प्रांत नहीं है। यह पश्चिमी चीन को अरब सागर से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण भौगोलिक संपर्क क्षेत्र है। लगातार बनी अस्थिरता चीनी नागरिकों, आधारभूत परियोजनाओं, परिवहन मार्गों और दीर्घकालिक निवेश योजनाओं के लिए खतरा पैदा करती है। चीनी नागरिकों पर लगातार हुए हमलों ने बीजिंग को सीपीईसी के आसपास की सुरक्षा स्थिति पर अधिक गंभीरता से ध्यान देने के लिए मजबूर किया है। लंबे समय तक चलने वाली अस्थिरता चीन की क्षेत्रीय संपर्क योजनाओं को जटिल बना सकती है और उसके आर्थिक निवेश की सुरक्षा लागत बढ़ा सकती है।

इसके प्रभाव ग्वादर तक सीमित नहीं हैं। अस्थिर बलूचिस्तान ऊर्जा परिवहन, खनिज आपूर्ति श्रृंखलाओं और मध्य-पूर्व, दक्षिण एशिया तथा पश्चिमी चीन को जोड़ने वाली समुद्री संपर्क व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। इसकी तटरेखा दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा समुद्री मार्गों के निकट स्थित है। इसलिए लंबे समय तक चलने वाला राजनीतिक या सैन्य संकट पाकिस्तान की सीमाओं से कहीं आगे तक प्रभाव डाल सकता है।

पाकिस्तान के लिए यह चुनौती मूलतः क्षेत्रीय अखंडता और आंतरिक एकता का प्रश्न है। इस्लामाबाद बलूचिस्तान के संबंध में किसी बड़े राजनीतिक समझौते को आसानी से स्वीकार नहीं कर सकता, क्योंकि इससे संघीय ढांचे के भविष्य को लेकर प्रश्न उठ सकते हैं। दूसरी ओर, राजनीतिक असंतोष, संसाधनों के असमान वितरण और शासन संबंधी समस्याओं का समाधान किए बिना केवल सैन्य कार्रवाई पर निर्भर रहना अलगाव की भावना को और गहरा कर सकता है। इसलिए यह समस्या केवल सैन्य नहीं, बल्कि राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और रणनीतिक भी है।

भारत के लिए बलूचिस्तान के प्रश्न को पाकिस्तान द्वारा दशकों से अपनाई गई असममित युद्ध रणनीति के संदर्भ में देखना आवश्यक है। 1947–48 के कश्मीर संघर्ष और 1965 के ऑपरेशन जिब्राल्टर से लेकर 1999 के कारगिल घुसपैठ और सीमा पार आतंकवाद के लगातार समर्थन तक पाकिस्तान ने भारत को चुनौती देने के लिए परंपरागत सैन्य शक्ति, घुसपैठ और आतंकवादी नेटवर्क का इस्तेमाल किया है। इस रणनीति को अक्सर “भारत को हजार घाव देकर रक्तस्राव कराने” की नीति के रूप में वर्णित किया जाता है। मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर ने भारत की प्रतिक्रिया में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत दिया, जब भारत ने सीमा पार आतंकवादी ढांचे के विरुद्ध कार्रवाई की। इस संदर्भ में एक संगठित और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली बलूच आंदोलन पाकिस्तान की रणनीतिक गणना को मूल रूप से बदल सकता है, क्योंकि इस्लामाबाद को अपनी सैन्य और खुफिया क्षमताओं का अधिक हिस्सा आंतरिक सुरक्षा में लगाना पड़ सकता है और इससे भारत के विरुद्ध प्रॉक्सी युद्ध के लिए उपलब्ध रणनीतिक गुंजाइश कम हो सकती है। इसलिए नई दिल्ली के लिए बलूचिस्तान का उभरता प्रश्न अत्यंत निकटता से देखने और भविष्य में पाकिस्तान के भीतर किसी भी बड़े राजनीतिक परिवर्तन के लिए तैयार रहने का विषय है, विशेषकर उसके पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर, चीनी हितों और व्यापक क्षेत्रीय सुरक्षा वातावरण पर पड़ने वाले प्रभावों को देखते हुए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 15 अगस्त 2016 के स्वतंत्रता दिवस संबोधन ने बलूचिस्तान को भारत के सार्वजनिक राजनयिक विमर्श में प्रमुखता से स्थान दिया, जब उन्होंने बलूचिस्तान, गिलगित-बाल्टिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर की स्थिति का उल्लेख किया। हालांकि भारत ने कभी भी बलूचिस्तान को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता नहीं दी है और न ही पाकिस्तान से उसके अलगाव का समर्थन करने वाली कोई औपचारिक नीति घोषित की है। यह अंतर महत्वपूर्ण है। स्वतंत्र बलूचिस्तान को मान्यता देना भारत-पाकिस्तान संबंधों में एक मौलिक परिवर्तन होगा और दक्षिण एशिया की रणनीतिक व्यवस्था पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है, विशेषकर तब जब चीन ने इस क्षेत्र में बड़े रणनीतिक निवेश किए हैं।

अंतरराष्ट्रीय आयाम भी उतना ही महत्वपूर्ण है। स्वतंत्रता की घोषणा अपने आप किसी क्षेत्र को संप्रभु राष्ट्र नहीं बना देती। अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्रभावी शासन, क्षेत्रीय नियंत्रण, स्थायी आबादी, अंतरराष्ट्रीय संबंध संचालित करने की क्षमता और अन्य देशों की राजनीतिक इच्छा जैसे अनेक कारकों पर निर्भर करती है। वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र का कोई भी सदस्य देश बलूचिस्तान को स्वतंत्र संप्रभु राष्ट्र के रूप में मान्यता नहीं देता।

इसीलिए जुलाई और अगस्त 2026 की घटनाओं को इस रूप में नहीं देखा जाना चाहिए कि कोई नया देश अस्तित्व में आ चुका है, बल्कि इन्हें बलूचिस्तान के प्रश्न को अंतरराष्ट्रीय बनाने के एक अधिक संगठित प्रयास के रूप में देखा जाना चाहिए। यह आंदोलन अपनी छवि को केवल विद्रोह और आंतरिक संघर्ष से बदलकर राष्ट्रीय आत्मनिर्णय और राज्य निर्माण के प्रश्न के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा है।

इसलिए व्यापक भू-राजनीतिक प्रश्न केवल यह नहीं है कि बलूचिस्तान स्वतंत्रता की घोषणा कर सकता है या नहीं। असली प्रश्न यह है कि क्या यह आंदोलन ऐसी राजनीतिक वैधता, क्षेत्रीय क्षमता, अंतरराष्ट्रीय समर्थन और संस्थागत संरचना विकसित कर सकता है, जो उसके दावे को लंबे समय तक बनाए रख सके।

पाकिस्तान के लिए दांव अस्तित्व का है। चीन के लिए यह सीपीईसी, ग्वादर और अरब सागर तक पहुंच का प्रश्न है। भारत के लिए यह पाकिस्तान और चीन के साथ रणनीतिक संतुलन तथा अपने विस्तारित पड़ोस की सुरक्षा से जुड़ा विषय है। व्यापक अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए बलूचिस्तान आतंकवाद, प्राकृतिक संसाधनों, समुद्री सुरक्षा, क्षेत्रीय संपर्क और बड़ी शक्तियों की प्रतिस्पर्धा के संगम पर खड़ा है।

13 जुलाई की घोषणा ने भले ही एक नया देश अस्तित्व में न लाया हो, लेकिन उसने एक नया भू-राजनीतिक प्रश्न अवश्य पैदा कर दिया है। यदि बलूच आंदोलन अपनी राजनीतिक पहचान को बनाए रखने, संस्थाओं का निर्माण करने और अंतरराष्ट्रीय ध्यान आकर्षित करने में सफल होता है, तो यह मुद्दा धीरे-धीरे पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा के एजेंडे से निकलकर अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक एजेंडे तक पहुंच सकता है।

इतिहास बताता है कि केवल घोषणाएं राष्ट्रों का निर्माण नहीं करतीं। राष्ट्र तब बनते हैं जब राजनीतिक आंदोलन टिकते हैं, संस्थाएं मजबूत होती हैं, क्षेत्र प्रभावी रूप से शासित होता है और अंततः अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त होती है। बलूचिस्तान भविष्य में पाकिस्तान का विवादित प्रांत बना रहेगा या एक मान्यता प्राप्त राष्ट्र के रूप में उभरेगा, यह केवल बलूचिस्तान के भीतर होने वाले घटनाक्रमों पर निर्भर नहीं करेगा, बल्कि इस्लामाबाद, बीजिंग, नई दिल्ली और दुनिया की अन्य राजधानियों में लिए जाने वाले निर्णय भी उतने ही निर्णायक होंगे।

फिलहाल बलूचिस्तान एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त नहीं है। लेकिन उसकी भौगोलिक स्थिति, प्राकृतिक संसाधन और रणनीतिक समुद्री तट यह सुनिश्चित करते हैं कि उसके भविष्य का प्रश्न अब दक्षिण एशिया, अरब सागर और हिंद-प्रशांत में उभरती व्यापक भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से अलग करके नहीं देखा जा सकता।