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पाकिस्तान का नया छद्मवेष: 'अरब-तुर्क' पहचान के मलबे से 'सिंधु सभ्यता' चुराने की हताश कोशिश: कर्नल देव आनंदकर्नल देव आनंद लोहामरोड़ लोहामरोड़

कर्नल देव आनंद लोहामरोड़ सुरक्षा एवं अंतर्राष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ....

विगत कुछ समय से वैश्विक मंचों और विशेषकर सिंगापुर जैसे अंतरराष्ट्रीय विमर्श के केंद्रों में पाकिस्तानी बुद्धिजीवियों और नीति-निर्माताओं द्वारा एक नया राग अलापा जा रहा है। कल तक जो मुल्क खुद को अरब के शेखों, तुर्की के सुल्तानों और फारस के शासकों का वैचारिक वारिस बताता था, वह अचानक खुद को 'इंडस वैली सिविलाइजेशन' यानी सिंधु घाटी सभ्यता का इकलौता पुत्र घोषित करने पर आमादा है। लेकिन क्या यह कोई वास्तविक हृदय परिवर्तन है या इतिहास की सबसे बड़ी बौद्धिक डकैती? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह नई कहानी पाकिस्तान के गहरे आंतरिक संकट, पहचान के खोखलेपन और भारत के खिलाफ रची जा रही एक नई रणनीतिक साजिश का जीवंत प्रमाण है।

पाकिस्तान एक ऐसा मुल्क है जिसका जन्म ही बिना किसी ऐतिहासिक और सभ्यतागत पहचान के हुआ था। पिछले पचहत्तर-अस्सी वर्षों से वहाँ की पाठ्यपुस्तकों से लेकर सेना के मानस तक, भारत से अलग दिखने की एक अंधी दौड़ चल रही है। शुरुआत में इन्होंने खुद को तुर्कों और मुगलों का वंशज बताया, लेकिन वे भूल गए कि अनातोलिया के लोग खुद मध्य एशिया से विस्थापित होकर वहाँ पहुंचे थे। जब तुर्की और ईरान ने भाव नहीं दिया, तो यह नैरेटिव ध्वस्त हो गया। इसके बाद पाकिस्तान ने अरब पहचान ओढ़ ली और खुद को अरबों की आध्यात्मिक संतान घोषित कर दिया, जिसका नतीजा यह हुआ कि आज अरब देश, विशेषकर यूएई और सऊदी अरब, भीख मांगने वाले इन पहचान चोरों को विमानों में भर-भरकर वापस भेज रहे हैं। यूएई ने तो स्पष्ट कह दिया है कि यहाँ से दफा हो जाओ। जब हर तरफ से लात पड़ी, तो चारों तरफ सभ्यताओं का घेरा देखकर पाकिस्तान घबरा गया। एक तरफ प्राचीन सभ्यता वाला ईरान है, ऊपर महाशक्ति चीन है, और पूर्व में सनातन संस्कृति का संवाहक भारत है।

इस 'नॉक-ऑन इफेक्ट' से बचने के लिए उन्होंने देखा कि उनके भूगोल में हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के अवशेष हैं, तो रातों-रात वे सिंधु के पुत्र बन गए। पाकिस्तान को यह बुनियादी बात समझनी होगी कि इस्लाम एक धर्म है जो अरब से उपजा, इसलिए दुनिया भर में मुस्लिम हो सकते हैं, लेकिन 'भारतीय' एक सभ्यता का नाम है, और सिंधु घाटी सभ्यता इसी महान भारतीय सनातन संरचना का एक अटूट हिस्सा है, कोई स्वतंत्र या अलग कटी हुई पहचान नहीं। इस वैचारिक पाखंड की हद देखिए कि एक तरफ पाकिस्तान के सूचना मंत्री और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर सिंधु सभ्यता का ढोल पीटते हैं, वहीं दूसरी तरफ उनके अपने ही वैज्ञानिक परवेज हुदभॉय चीख-चीख कर कह रहे हैं कि पाकिस्तान के विज्ञान के पाठ्यक्रम में भी कट्टरता ठूंस दी गई है। वहाँ विज्ञान अब विज्ञान नहीं रहा बल्कि उसका पूरी तरह इस्लामीकरण कर दिया गया है। यह कैसी विडंबना है कि मिसाइलों के नाम आज भी उन हमलावरों अब्दाली और गौरी पर रखे जाते हैं जो अफगानिस्तान से आए थे, और आज उसी अफगानिस्तान से आ रहे ड्रोनों और हमलों से सुरक्षा के लिए इन्हें सिंधु की ढाल याद आ रही है।

पाकिस्तान के इस सिंधु राग के पीछे केवल मानसिक विचलन नहीं, बल्कि एक सोची-समझी आर्थिक रणनीति और 'डॉलर हंटिंग' का खेल भी है। पाकिस्तान दुनिया के कुछ तथाकथित उदारवादी गोरे देशों जैसे ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड को यह दिखाना चाहता है कि वे एक महान ऐतिहासिक विरासत के संरक्षक हैं, ताकि इन खंडहरों के संरक्षण के नाम पर उन्हें अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से मोटी फंडिंग मिले। इसके साथ ही, यह पैंतरा उनके आंतरिक मोर्चों से जनता का ध्यान भटकाने के लिए है। आज पाकिस्तान आर्थिक रूप से दिवालिया होने की कगार पर है। बलूचिस्तान में स्वतंत्रता की आग धधक रही है जहाँ बलूच नेता अख्तर मेंगल नेशनल असेंबली में खड़े होकर पाकिस्तानी फौज को उसकी औकात और १९७१ की याद दिला रहे हैं। पीओके में विद्रोह का बिगुल बज चुका है और वहां की जनता भारत की तरफ देख रही है, जबकि अफगानिस्तान से मिला 'स्ट्रैटेजिक डेप्थ' का सपना अब 'स्ट्रैटेजिक ब्लोबैक' में बदल चुका है। ऐसे में जनता को यह अफीम चटाई जा रही है कि हम सिंधु के राजा हैं और यह आर्थिक बदहाली छोटी बात है, फील्ड मार्शल सब ठीक कर देंगे। इस सभ्यतागत नाटक का दूसरा सिरा सिंधु जल संधि से जुड़ा है। पाकिस्तान भारत को परमाणु बम की गीदड़भभकी देता है कि अगर पानी रोका तो हमला कर देंगे, लेकिन सच यह है कि भारत के प्रधानमंत्री ने बेहद स्पष्ट शब्दों में कहा है कि सिंधु का एक-एक बूंद पानी, जो भारत के हिस्से का है, वह पाकिस्तान नहीं जाएगा। पाकिस्तान यह दुष्प्रचार कर रहा है कि भारत इस संधि से बाहर नहीं निकल सकता, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानून के जानकारों को १९६९ के वियना कन्वेंशन के क्लॉज ६५ से ६७ को पढ़ना चाहिए।

यदि परिस्थितियों में मौलिक बदलाव हो, तो किसी भी देश को संधि से हटने या पुनर्विचार करने का पूर्ण अधिकार है, जैसा कि अमेरिका ने ईरान के साथ जेसीपीओए डील तोड़कर और रूस-अमेरिका ने आईएनएफ ट्रीटी को रद्दी की टोकरी में डाल कर किया था। भारत ने २०२३ और २०२४ में लगातार पाकिस्तान को नोटिस दिया कि इस संधि पर नए सिरे से बात की जाए, लेकिन आतंकवाद के इस प्रायोजक ने कोई जवाब नहीं दिया। भारत ने अब पाकिस्तान को जल कूटनीति के मोर्चे पर 'तीन तलाक' दे दिया है कि अपना रास्ता नापो, अपने हिस्से का दरिया लो, हमारे हिस्से का एक कतरा भी तुम्हें नसीब नहीं होगा। पाकिस्तानी हुक्मरान जब भारत के साथ 'ट्रैक टू' डिप्लोमेसी या 'अमन की आशा' का नाटक करते हैं, तो वे भूल जाते हैं कि उनका इतिहास और वर्तमान केवल रक्तचरित्र से भरा है। जो मुल्क अपने ही लोगों के साथ शांति से नहीं रह सकता, वह पड़ोसियों को क्या शांति देगा? १९७१ में अपने ही भाइयों यानी बंगालियों का नरसंहार करने वाली और लाखों माताओं-बहनों का शीलभंग करने वाली इस फौज पर वैश्विक समुदाय की खामोशी शर्मनाक है। आज भी बलूचों, पश्तूनों, शियाओं, मुहाजिरों और पीओके के कश्मीरियों का दमन बदस्तूर जारी है। जब भी भारत कड़ा रुख अपनाता है, इनके हुक्मरान जैसे कभी जिया-उल-हक या मुशर्रफ करते थे,

क्रिकेट मैच देखने या शांति वार्ता का नाटक करने आ जाते हैं। यह केवल भारत का समय बर्बाद करने और आतंकवाद की अगली खेप तैयार करने के लिए 'समय खरीदने' की पुरानी रणनीति है। हजारों साल पुरानी सिंधु सभ्यता का हिस्सा बनने की पहली शर्त यह स्वीकार करना है कि आपके पूर्वज हिंदू थे। यदि पाकिस्तानी मुल्क में इतनी हिम्मत और ईमानदारी है, तो वे पहले भारत से अपनी आतंकी हरकतों के लिए माफी मांगें। यह भारत के उन पुराने मोमबत्ती ब्रिगेड और बिरयानी कूटनीति के पैरोकारों के लिए भी एक सबक है जो पाकिस्तान के इस जाल में फंस जाते हैं। यह तो शुक्र है कि आज के भारत की सोशल मीडिया जनरेशन का मानस पूरी तरह स्पष्ट और राष्ट्रवादी है, जो पाकिस्तान के इस शांति ड्रामे की असलियत को बखूबी समझती है। भारत अब न तो अपनी सभ्यता चुराने देगा, और न ही अपने हक का पानी।