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रूस-यूक्रेन युद्ध की आग में नया मोड़: पुतिन के निवास पर कथित ड्रोन हमला और वैश्विक तनाव की बढ़ती कगार.... कर्नल देव आनंद लोहामरोड़.....

रूस और यूक्रेन के बीच दो वर्षों से अधिक समय से जारी युद्ध अब एक ऐसे खतरनाक मोड़ पर पहुँचता दिख रहा है, जहाँ संघर्ष केवल सैन्य मोर्चों, शहरों या बुनियादी ढाँचों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि राष्ट्रप्रमुखों की व्यक्तिगत सुरक्षा और अस्तित्व तक विमर्श के केंद्र में आ गया है। 25 दिसंबर 2025 को क्रिसमस ईव के अवसर पर यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर ज़ेलेंस्की द्वारा रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के लिए सार्वजनिक रूप से अत्यंत कटु और अस्वीकार्य भाषा का प्रयोग किया जाना और उसके ठीक चार दिन बाद, 29 दिसंबर की रात रूस द्वारा यह दावा किया जाना कि नोवगोरोद क्षेत्र के वाल्दाई में स्थित पुतिन के अत्यधिक सुरक्षित आधिकारिक निवास को बड़ी संख्या में ड्रोन के माध्यम से निशाना बनाने का प्रयास हुआ, इस युद्ध की दिशा में आए खतरनाक बदलाव को रेखांकित करता है। यूक्रेन ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए उन्हें रूसी प्रचार बताया है और स्वतंत्र रूप से इन दावों की पुष्टि नहीं हो सकी है, किंतु अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ऐसे दावे, विशेषकर जब वे किसी परमाणु शक्ति के सर्वोच्च नेतृत्व से जुड़े हों, स्वयं में ही गंभीर रणनीतिक परिणाम पैदा करने की क्षमता रखते हैं।

रूस का तर्क है कि किसी राष्ट्रपति निवास को लक्ष्य बनाने का प्रयास पारंपरिक युद्ध की सीमाओं का उल्लंघन है और इसे राज्य-प्रायोजित आतंकवाद की श्रेणी में देखा जाना चाहिए। रूस के राष्ट्रपति के क्रेमलिन, नोवो- ओगार्योवो, सोची, वाल्दाई और सेंट पीटर्सबर्ग जैसे विभिन्न आधिकारिक एवं अर्द्ध-आधिकारिक निवासों की सुरक्षा रूस की फेडरल प्रोटेक्टिव सर्विस के हाथ में होती है, जो बहु-स्तरीय वायु-रक्षा, काउंटर-ड्रोन प्रणालियों, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर, सुरक्षित संचार नेटवर्क और भूमिगत कमांड-सेंटरों से युक्त मानी जाती है। ऐसे में इन स्थलों को लेकर किसी भी हमले का दावा सीधे रूस की “रेड लाइन” से जुड़ जाता है और यह संकेत देता है कि युद्ध अब मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक उकसावे के अत्यंत संवेदनशील चरण में प्रवेश कर चुका है।

इसी पृष्ठभूमि में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिसंबर 2025 के अंत में इस घटनाक्रम पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इस प्रकार की कार्रवाइयों से तनाव और अधिक बढ़ता है और इससे वैश्विक शांति को गंभीर खतरा उत्पन्न होता है। प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट रूप से यह रेखांकित किया कि युद्ध का कोई सैन्य समाधान नहीं है और रूस-यूक्रेन संघर्ष को समाप्त करने के लिए कूटनीतिक संवाद, संयम और शांति प्रयासों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, ताकि यह टकराव व्यापक वैश्विक संघर्ष में न बदल जाए। उनका यह रुख भारत की दीर्घकालिक रणनीतिक सोच के अनुरूप है, जिसमें टकराव के बजाय संवाद और संतुलन को महत्व दिया जाता रहा है।
अमेरिकी पक्ष से भी इस कथित ड्रोन हमले पर चिंता प्रकट की गई। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 29 दिसंबर 2025 को एक बातचीत में कहा कि पुतिन के निवास से जुड़ी हमले की खबर उन्हें गहरी निराशा और चिंता में डालने वाली लगी, क्योंकि यह एक ऐसे समय पर सामने आई है जब संघर्ष को शांत करने के प्रयासों की आवश्यकता है, न कि उसे और भड़काने की।

इसी क्रम में उन्होंने यह भी संकेत दिया कि संयुक्त राज्य अमेरिका ने यूक्रेन को लंबी दूरी की “Tomahawk” क्रूज़ मिसाइलें जानबूझकर नहीं दीं, क्योंकि ऐसे हथियारों का उपयोग युद्ध के दायरे को खतरनाक रूप से विस्तारित कर सकता है और सीधे टकराव की स्थिति पैदा कर सकता है। यह टिप्पणी इस बात की ओर इशारा करती है कि वॉशिंगटन भी इस चरण में संघर्ष के अनियंत्रित विस्तार को लेकर आशंकित है। हालाँकि यूरोपीय संघ और उसके प्रमुख सदस्य देशों की सार्वजनिक प्रतिक्रियाएँ अब तक अत्यंत नपी-तुली या लगभग मौन रही हैं, फिर भी यह स्पष्ट है कि वैश्विक नेतृत्व वर्ग इस बात को समझता है कि यदि युद्ध राष्ट्रप्रमुखों की व्यक्तिगत सुरक्षा तक केंद्रित होने लगा, तो फिर उसे नियंत्रित रखना अत्यंत कठिन हो जाएगा। ऐसे परिदृश्य में साइबर-युद्ध, ऊर्जा अवसंरचनाओं पर हमले, नाटो-रूस सीमाओं पर सीधी भिड़ंत और यहाँ तक कि सामरिक परमाणु हथियारों के उपयोग की आशंका भी केवल सैद्धांतिक नहीं रह जाएगी।

इसका प्रभाव केवल रूस और यूक्रेन तक सीमित नहीं रहेगा। वैश्विक ऊर्जा बाज़ारों में उथल-पुथल, खाद्य और उर्वरक संकट, समुद्री व्यापार में व्यवधान और शरणार्थी समस्या का विस्तार विकासशील देशों को सबसे अधिक प्रभावित करेगा। भारत, जो रूस से ऊर्जा आयात करता है और यूक्रेन क्षेत्र से जुड़ी कृषि आपूर्ति-श्रृंखलाओं पर भी निर्भर है, के लिए यह स्थिति विशेष सतर्कता की माँग करती है। भारत को कूटनीतिक संतुलन बनाए रखते हुए अपनी ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करना, आपूर्ति-श्रृंखलाओं का विविधीकरण करना और BRICS जैसे बहुपक्षीय मंचों पर शांति वार्ता को सक्रिय रूप से आगे बढ़ाना होगा।

अंततः सबसे बड़ा और मूल प्रश्न यही है कि क्या विश्व नेतृत्व समय रहते यह समझ पाएगा कि परमाणु युग में किसी भी पक्ष की “पूर्ण सैन्य विजय” अंततः मानवता की सामूहिक पराजय में बदल जाती है। हर नया ड्रोन, हर नई मिसाइल और हर तीखा राजनीतिक बयान इस सच्चाई को और स्पष्ट करता जा रहा है कि युद्ध को बढ़ाना नहीं, बल्कि उसे समाप्त करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति ही वास्तविक समाधान है। यदि इस निर्णायक क्षण में संयम, संवाद और विवेक को प्राथमिकता नहीं दी गई, तो इतिहास यह दर्ज नहीं करेगा कि किसका दावा सही था, बल्कि यह अवश्य पूछेगा कि जब चेतावनी के संकेत स्पष्ट थे, तब मानवता ने रुकने का साहस क्यों नहीं दिखाया।