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विक्रम संवत: भारत की कालगणना की असली पहचान, जिसे पुनर्स्थापित करने का समय आ गया है... लेखक: कर्नल देव आनंद लोहामरोर

भारत की सभ्यता केवल प्राचीन ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक, सांस्कृतिक और खगोलीय दृष्टि से अत्यंत उन्नत रही है। इस उन्नत परंपरा का एक प्रमुख आधार है—विक्रम संवत, जो भारतीय कालगणना की सबसे प्राचीन, व्यवस्थित और वैज्ञानिक प्रणालियों में से एक है। फिर भी, यह एक गंभीर और विचारणीय प्रश्न है कि इतनी समृद्ध और सटीक प्रणाली होने के बावजूद इसे भारत का आधिकारिक राष्ट्रीय कैलेंडर क्यों नहीं बनाया गया? क्या यह केवल प्रशासनिक निर्णय था या इसके पीछे कोई गहरी वैचारिक प्रवृत्ति भी काम कर रही थी?

विक्रम संवत की उत्पत्ति उज्जयिनी के महान सम्राट विक्रमादित्य से मानी जाती है, जिसकी शुरुआत 57 ईसा पूर्व से होती है। यह केवल ऐतिहासिक गौरव का प्रतीक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत संतुलित प्रणाली है। यह एक चंद्र-सौर (Lunisolar) कैलेंडर है, जिसमें चंद्रमा के आधार पर महीनों और सूर्य के आधार पर वर्ष की गणना की जाती है। इस कारण भारतीय त्यौहार, व्रत, संस्कार, विवाह मुहूर्त आदि सभी इसी के अनुसार निर्धारित होते हैं और ऋतुओं के साथ पूर्ण सामंजस्य बनाए रखते हैं। प्राचीन भारतीय ग्रंथ सूर्य सिद्धांत में वर्ष की गणना—365 दिन, 15 घटी, 31 विफल और 34 प्रति विफल—आधुनिक विज्ञान के अत्यंत निकट है। यह इस बात का प्रमाण है कि भारतीय खगोलशास्त्र अपने समय से कहीं आगे था,

जबकि यूरोप में लंबे समय तक वर्ष को 360 दिनों का माना जाता रहा। विक्रम संवत की एक और महत्वपूर्ण विशेषता है—अधिक मास (मलमास) की वैज्ञानिक व्यवस्था, जिसे लगभग हर तीसरे वर्ष जोड़ा जाता है, ताकि चंद्र और सौर गणनाओं के बीच संतुलन बना रहे। यही कारण है कि भारतीय त्यौहार सदैव अपनी निर्धारित ऋतु में ही आते हैं। इसके विपरीत, स्वतंत्रता के बाद 1955 में गठित कैलेंडर सुधार समिति की सिफारिशों के आधार पर भारत सरकार ने 22 मार्च 1957 से शक संवत को राष्ट्रीय कैलेंडर के रूप में अपनाया। यह पूर्णतः सूर्य आधारित प्रणाली है, जिसकी तिथियाँ स्थिर होती हैं और प्रशासनिक कार्यों के लिए सरल मानी जाती हैं।

लेकिन यहीं से एक महत्वपूर्ण वैचारिक बहस शुरू होती है—क्या भारत की हजारों वर्षों पुरानी कालगणना प्रणाली को केवल “जटिल” बताकर किनारे कर देना उचित था? क्या यह निर्णय केवल प्रशासनिक सुविधा का परिणाम था, या उस समय की नीति-निर्माण प्रक्रिया में एक ऐसी मानसिकता प्रभावी थी, जो भारतीय परंपराओं से दूरी बनाकर चलना चाहती थी? इतिहास के कुछ दृष्टिकोण यह भी बताते हैं कि “शक” शब्द विदेशी मूल के आक्रांताओं से जुड़ा है, जिन्होंने भारत में शासन स्थापित किया था। ऐसे में यह प्रश्न और भी गहरा हो जाता है कि जिस संवत का संबंध भारतीय मूल परंपरा से नहीं था, उसे प्राथमिकता क्यों दी गई, जबकि विक्रम संवत सदियों से भारतीय जीवन का अभिन्न हिस्सा रहा है।

स्वतंत्रता के बाद “धर्मनिरपेक्षता” की व्याख्या के नाम पर कई पारंपरिक भारतीय प्रतीकों को धीरे-धीरे हाशिए पर डाल दिया गया। विक्रम संवत भी उसी प्रक्रिया का एक उदाहरण बन गया। हालांकि इसे पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सका, क्योंकि यह भारतीय समाज की चेतना में गहराई से समाहित है। आज भी विवाह, त्यौहार, व्रत, गृह प्रवेश और धार्मिक अनुष्ठान विक्रम संवत के अनुसार ही निर्धारित होते हैं। यदि हम वैश्विक परिप्रेक्ष्य देखें, तो पाएंगे कि दुनिया के विभिन्न समुदाय अपनी-अपनी कालगणना प्रणालियों के अनुसार नववर्ष मनाते हैं।

ईसाई समुदाय 1 जनवरी को ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार नववर्ष मनाता है, पारसी समुदाय नवरोज मनाता है, सिख बैसाखी से नया वर्ष प्रारंभ करते हैं, जैन समुदाय दीपावली के अगले दिन से नववर्ष मानता है, जबकि इस्लामी हिजरी कैलेंडर पूर्णतः चंद्र आधारित है। ऐसे में यह प्रश्न और भी प्रासंगिक हो जाता है कि क्या भारत को अपनी मूल कालगणना प्रणाली को केवल परंपरा तक सीमित रखना चाहिए, या उसे राष्ट्रीय स्तर पर पुनर्स्थापित करना चाहिए? नेपाल इसका एक सशक्त उदाहरण है, जहाँ आज भी विक्रम संवत राष्ट्रीय कैलेंडर के रूप में प्रचलित है और दैनिक जीवन में उपयोग होता है। भारत के भीतर भी मध्य प्रदेश जैसे राज्यों द्वारा इसे आधिकारिक रूप से अपनाने की पहल इस दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने हाल के वर्षों में कई प्रतीकात्मक और वैचारिक बदलाव देखे हैं—औपनिवेशिक प्रतीकों का परित्याग, ऐतिहासिक नामों की पुनर्स्थापना, और सांस्कृतिक पहचान को पुनर्जीवित करने के प्रयास। यह एक व्यापक मानसिक परिवर्तन की ओर संकेत करता है, जिसमें भारत अपनी जड़ों की ओर लौटने का प्रयास कर रहा है। ऐसे में यह विचार और भी प्रबल हो जाता है कि भारत अपनी कालगणना प्रणाली को भी पुनः सम्मानित स्थान क्यों न दे? आज का डिजिटल युग वह युग है, जहाँ जटिल से जटिल गणनाएँ भी सहजता से संभव हैं।

ऐसे में “जटिलता” का तर्क अब प्रासंगिक नहीं रह जाता। आवश्यकता है एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की—जहाँ अंतरराष्ट्रीय और प्रशासनिक कार्यों के लिए ग्रेगोरियन कैलेंडर का उपयोग जारी रहे, वहीं राष्ट्रीय, सांस्कृतिक और आधिकारिक आयोजनों में विक्रम संवत को समानांतर आधिकारिक मान्यता दी जाए। सरकारी दस्तावेजों, राष्ट्रीय कार्यक्रमों, उद्घाटनों और शिक्षा प्रणाली में भारतीय पंचांग की तिथियों को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाना चाहिए। इससे न केवल हमारी सांस्कृतिक पहचान मजबूत होगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियाँ भी अपनी जड़ों से जुड़ी रहेंगी।

अंततः, यह केवल एक कैलेंडर का प्रश्न नहीं है—यह भारत की सांस्कृतिक अस्मिता, ऐतिहासिक चेतना और बौद्धिक स्वाभिमान का प्रश्न है। ग्रेगोरियन कैलेंडर हमारी आवश्यकता हो सकता है, लेकिन विक्रम संवत हमारी पहचान है। और जब कोई राष्ट्र अपनी पहचान को पुनः स्थापित करता है, तभी वह वास्तविक अर्थों में आत्मनिर्भर और आत्मसम्मानी बनता है। अब समय आ गया है कि भारत अपनी इस गौरवशाली कालगणना प्रणाली को केवल परंपरा के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय गौरव और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के प्रतीक के रूप में पुनर्स्थापित करे।