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रूस-यूक्रेन युद्ध का नया चरण: ड्रोन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और बदलती वैश्विक युद्धकला से भारत के लिए सबक.

रूस-यूक्रेन युद्ध का नया चरण: ड्रोन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और बदलती वैश्विक युद्धकला से भारत के लिए सबक.. लेखक: कर्नल देव आनंद लोहामारोर (सेवानिवृत्त)
 सुरक्षा एवं अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार...

24 फरवरी 2022 को जब रूस ने यूक्रेन पर व्यापक सैन्य अभियान प्रारम्भ किया, तब अधिकांश सैन्य विश्लेषकों का अनुमान था कि यह संघर्ष कुछ सप्ताह अथवा कुछ महीनों में समाप्त हो जाएगा। किन्तु चार वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद भी यह युद्ध केवल जारी ही नहीं है, बल्कि लगातार नए स्वरूप ग्रहण करता जा रहा है। लाखों सैनिक और नागरिक इस संघर्ष की प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष कीमत चुका चुके हैं। संयुक्त राष्ट्र तथा विभिन्न अंतरराष्ट्रीय आकलनों के अनुसार नागरिक हताहतों की संख्या लगातार बढ़ी है, जबकि दोनों पक्षों के सैन्य नुकसान कई लाख तक पहुँचने के अनुमान लगाए जाते हैं। इस युद्ध ने केवल रूस और यूक्रेन को नहीं बदला, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, खाद्यान्न आपूर्ति, हथियार उद्योग, वैश्विक व्यापार, नाटो की भूमिका तथा विश्व व्यवस्था को भी नए सिरे से परिभाषित किया है। आज यह स्पष्ट हो चुका है कि इक्कीसवीं सदी का युद्ध केवल टैंकों, तोपों और लड़ाकू विमानों का नहीं, बल्कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ड्रोन, साइबर क्षमता, सटीक प्रहार और महत्वपूर्ण अवसंरचना पर नियंत्रण का युद्ध बन चुका है।

युद्ध के प्रारम्भिक चरण में रूस ने बड़े पैमाने पर बख्तरबंद वाहनों, मिसाइलों और वायु शक्ति का उपयोग करते हुए शीघ्र विजय प्राप्त करने का प्रयास किया। दूसरी ओर यूक्रेन ने अपनी सीमित सैन्य क्षमता की भरपाई पश्चिमी देशों से प्राप्त आधुनिक हथियारों, उपग्रह आधारित खुफिया जानकारी और उन्नत ड्रोन तकनीक के माध्यम से की। समय बीतने के साथ यह संघर्ष पारंपरिक युद्ध से निकलकर तकनीकी प्रतिस्पर्धा में परिवर्तित हो गया। आज दोनों पक्ष प्रतिदिन सैकड़ों ड्रोन और मिसाइलों का उपयोग कर रहे हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित ड्रोन, लॉइटरिंग म्यूनिशन, स्वार्म ड्रोन तथा लंबी दूरी के सटीक प्रहार इस युद्ध की नई पहचान बन चुके हैं। पिछले कुछ महीनों में यूक्रेन ने अपनी रणनीति में महत्वपूर्ण परिवर्तन करते हुए रूस की ऊर्जा अवसंरचना को प्राथमिक लक्ष्य बनाया है। तेल रिफाइनरियों, ईंधन भंडारों, पाइपलाइनों तथा लॉजिस्टिक केंद्रों पर लगातार ड्रोन हमलों ने रूस के अनेक क्षेत्रों में ईंधन संकट उत्पन्न कर दिया।

यह रणनीति केवल आर्थिक क्षति पहुँचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य रूस की सैन्य आपूर्ति श्रृंखला तथा नागरिक अर्थव्यवस्था दोनों को प्रभावित करना है। रूस के अनेक कृषि क्षेत्रों में ईंधन की कमी के कारण बुवाई, सिंचाई, ट्रैक्टर संचालन तथा फसल परिवहन में कठिनाइयों की शिकायत की। एक ऊर्जा महाशक्ति के भीतर ईंधन की स्थानीय कमी अपने आप में इस युद्ध की बदलती प्रकृति को दर्शाती है। यही कारण है कि हाल के महीनों में एक अत्यंत रोचक और अप्रत्याशित परिस्थिति देखने को मिली। जो रूस वर्षों से विश्व के अनेक देशों को पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात करता रहा, वही रूस कुछ परिस्थितियों में भारत से गैसोलीन आयात करने को विवश हुआ। भारतीय रिफाइनरियों से भेजे गए पेट्रोलियम उत्पादों ने रूस के कुछ क्षेत्रों में अस्थायी राहत प्रदान की। यह घटना केवल व्यापार नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा राजनीति की नई वास्तविकता का संकेत है।

 

युद्ध के दौरान मित्रता, व्यापार और रणनीतिक आवश्यकताएँ परिस्थितियों के अनुसार बदलती रहती हैं। हालाँकि पश्चिमी मीडिया में रूस के ईंधन संकट को उसकी सैन्य कमजोरी के रूप में प्रस्तुत किया गया, किन्तु वास्तविकता अधिक जटिल है। रूस की सैन्य प्रणाली नागरिक आवश्यकताओं की तुलना में सेना को प्राथमिकता देती है। इसलिए नागरिक क्षेत्रों में ईंधन संकट दिखाई देने के बावजूद सैन्य अभियानों पर उसका प्रभाव अपेक्षाकृत सीमित रहा। इसी अवधि में रूस ने यूक्रेन की राजधानी कीव सहित अनेक शहरों पर बड़े पैमाने पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए। कई अवसरों पर एक ही रात में सैकड़ों ड्रोन और दर्जनों मिसाइलें दागी गईं। रूस ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि ऊर्जा अवसंरचना पर हुए हमलों का उत्तर वह और अधिक व्यापक सैन्य कार्रवाई से देगा।

जमीनी मोर्चे पर भी स्थिति लगातार बदल रही है। डोनबास, कुपियांस्क, सुमी तथा खार्किव क्षेत्रों में रूस धीरे-धीरे आगे बढ़ने का प्रयास कर रहा है। अनेक सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि यूक्रेन ने रूस की रसद व्यवस्था और ईंधन आपूर्ति को क्षति पहुँचाने में सफलता अवश्य प्राप्त की है, किन्तु वह रूस की समग्र सैन्य प्रगति को रोकने में अभी तक निर्णायक रूप से सफल नहीं हुआ है। दूसरी ओर रूस भी अपेक्षा से कहीं अधिक समय, संसाधन और मानव बल इस युद्ध में झोंक चुका है। यही कारण है कि यह संघर्ष किसी त्वरित समाधान की ओर बढ़ता हुआ दिखाई नहीं देता। युद्ध के राजनीतिक नेतृत्व का प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर ज़ेलेंस्की ने कठिन परिस्थितियों में अपने देश का नेतृत्व किया और पश्चिमी देशों का व्यापक समर्थन प्राप्त किया। साथ ही, उनके सार्वजनिक वक्तव्य और राजनीतिक शैली कई बार चर्चा का विषय भी बनी।

किसी भी लोकतांत्रिक नेता के लिए युद्धकाल में मनोबल बनाए रखना आवश्यक होता है, किन्तु अंततः किसी भी नेतृत्व की सबसे बड़ी कसौटी अपने नागरिकों और सैनिकों के जीवन की रक्षा होती है। दूसरी ओर रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी यह संकेत दिया है कि वे लंबे संघर्ष के लिए तैयार हैं और अपने घोषित सामरिक उद्देश्यों से पीछे हटने के इच्छुक नहीं दिखते। इस कारण दोनों पक्षों के बीच शीघ्र शांति समझौते की संभावना सीमित प्रतीत होती है।

वास्तविकता यह है कि यह युद्ध अभी समाप्ति से काफी दूर है। नाटो यूक्रेन को आर्थिक, तकनीकी और सैन्य सहायता देकर रूस को दीर्घकालिक रूप से कमजोर करना चाहता है, जबकि रूस अपने कब्जे वाले क्षेत्रों पर नियंत्रण बनाए रखते हुए सामरिक बढ़त स्थापित करना चाहता है। किसी भी पक्ष को निर्णायक विजय अभी तक प्राप्त नहीं हुई है। ऐसी स्थिति में संघर्ष के लंबे समय तक जारी रहने की संभावना बनी हुई है। केवल वही परिस्थिति युद्ध की दिशा अचानक बदल सकती है जब किसी पक्ष द्वारा अत्यधिक विनाशकारी सैन्य क्षमता का प्रयोग किया जाए या कोई बड़ा राजनीतिक समझौता हो। अन्यथा वर्तमान परिस्थितियाँ लंबी थकाऊ लड़ाई की ओर संकेत करती हैं।

यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था भी इस युद्ध से पूरी तरह बदल चुकी है। पोलैंड, बाल्टिक देश तथा अन्य पूर्वी यूरोपीय राष्ट्र अपनी सीमाओं की सुरक्षा को लेकर पहले से कहीं अधिक सतर्क हैं। बेलारूस में रूस की सैन्य उपस्थिति तथा दोनों देशों के बीच घनिष्ठ सामरिक सहयोग ने नाटो की चिंताएँ बढ़ा दी हैं। यदि भविष्य में किसी प्रकार की सीमा-संबंधी घटना या सैन्य टकराव होता है तो उसका प्रभाव केवल यूक्रेन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि समूचे यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। इस पूरे युद्ध से भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण सबक निकलते हैं। पहला और सबसे बड़ा सबक यह है कि भविष्य के युद्धों में महत्वपूर्ण अवसंरचना सबसे पहले निशाने पर होगी। तेल रिफाइनरियाँ, बिजली उत्पादन केंद्र, गैस पाइपलाइन, रेलवे जंक्शन, पुल, संचार नेटवर्क, एयरबेस, बंदरगाह और डेटा केंद्र किसी भी आधुनिक राष्ट्र की जीवनरेखा हैं।

यदि इन पर सटीक ड्रोन और मिसाइल हमले होते हैं तो बिना किसी बड़े जमीनी युद्ध के भी विरोधी देश की अर्थव्यवस्था और सैन्य क्षमता को गंभीर क्षति पहुँचाई जा सकती है। भारत ने हाल के वर्षों में इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। स्वदेशी ड्रोन, लॉइटरिंग म्यूनिशन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी प्रणाली, काउंटर-ड्रोन तकनीक, बहुस्तरीय वायु रक्षा तथा स्वदेशी मिसाइल कार्यक्रमों पर निवेश तेज़ी से बढ़ाया गया है। भारतीय सशस्त्र बलों ने बड़ी संख्या में विभिन्न श्रेणी के ड्रोन और एंटी-ड्रोन प्रणालियों की खरीद तथा स्वदेशी निर्माण को प्राथमिकता दी है।

ऑपरेशन सिंदूर ने भी यह स्पष्ट कर दिया कि हाइब्रिड और छद्म युद्ध के इस दौर में, दुश्मन के रणनीतिक और आतंकवादी ढाँचों पर सटीक, त्वरित और सीमित सैन्य कार्रवाई आधुनिक युद्धकला का महत्वपूर्ण भाग बन चुकी है। यदि भविष्य में भारत को किसी भी पड़ोसी देश के साथ संघर्ष का सामना करना पड़ता है, तो केवल सीमा पर सैनिकों की संख्या नहीं, बल्कि ड्रोन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, साइबर क्षमता, अंतरिक्ष आधारित निगरानी तथा महत्वपूर्ण अवसंरचना की सुरक्षा निर्णायक भूमिका निभाएँगे। भारत के लिए दूसरा बड़ा सबक आत्मनिर्भरता का है। आधुनिक युद्ध केवल सैनिकों से नहीं जीते जाते; उन्हें उद्योग, प्रौद्योगिकी, ऊर्जा, सेमीकंडक्टर, सॉफ्टवेयर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मजबूत आपूर्ति श्रृंखला भी जिताती है। यदि किसी राष्ट्र की महत्वपूर्ण तकनीक, इंजन, इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली या सॉफ्टवेयर पूरी तरह विदेशी स्रोतों पर निर्भर हों, तो युद्ध अथवा भू-राजनीतिक तनाव के समय वह गंभीर दबाव में आ सकता है।

इसलिए रक्षा उत्पादन से लेकर डिजिटल प्लेटफॉर्म और ऊर्जा सुरक्षा तक आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा केवल आर्थिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की अनिवार्य आवश्यकता बन चुकी है। रूस-यूक्रेन युद्ध ने यह भी सिद्ध कर दिया है कि भविष्य की विजय केवल युद्धक्षेत्र में नहीं, बल्कि कारखानों, अनुसंधान प्रयोगशालाओं, ऊर्जा संयंत्रों, कृत्रिम बुद्धिमत्ता के एल्गोरिद्म and औद्योगिक क्षमता में तय होगी। जो राष्ट्र तेज़ी से ड्रोन बनाएगा, अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करेगा, साइबर और अंतरिक्ष क्षमता विकसित करेगा तथा अपनी आपूर्ति श्रृंखलाओं को सुरक्षित रखेगा, वही आने वाले दशकों में सामरिक बढ़त प्राप्त करेगा।
अंततः रूस-यूक्रेन युद्ध केवल दो देशों का संघर्ष नहीं है। यह इक्कीसवीं सदी की युद्धकला का जीवंत प्रयोगशाला बन चुका है, जहाँ प्रतिदिन नई तकनीकें, नई रणनीतियाँ और नए सैन्य सिद्धांत विकसित हो रहे हैं। भारत को इस युद्ध को केवल दूर से देखने के बजाय उससे सीख लेकर अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा, औद्योगिक आत्मनिर्भरता, ऊर्जा सुरक्षा और रक्षा आधुनिकीकरण को और अधिक गति देनी होगी। क्योंकि भविष्य के युद्ध सीमाओं पर शुरू होने से पहले तकनीक, अर्थव्यवस्था, ऊर्जा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में जीते या हारे जाएँगे।