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सुप्रीम कोर्ट: 30 हफ्ते की प्रेग्नेंट नाबालिग को मिल सकती है अबॉर्शन की इजाजत

दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक 15 साल की रेप पीड़िता को 30 हफ्ते के गर्भ को गिराने की अनुमति देने वाले अपने फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने इस मामले में केंद्र सरकार को कानून में बदलाव करने के लिए महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए हैं।

 

AIIMS की याचिका को किया खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने 24 अप्रैल को करीब सात महीने (30 हफ्ते) की गर्भवती नाबालिग को अबॉर्शन कराने की इजाजत दी थी। इसके खिलाफ AIIMS ने याचिका दायर की थी, क्योंकि वर्तमान भारतीय कानून के अनुसार रेप के मामलों में अधिकतम 24 हफ्ते तक की प्रेग्नेंसी में ही गर्भपात की कानूनी अनुमति है। कोर्ट ने इस याचिका को सुनने से मना करते हुए अपने पुराने फैसले को बरकरार रखा।

 

"समय के साथ बदले कानून" – CJI

सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने कानून की सीमाओं पर टिप्पणी करते हुए कहा कि कानून ऐसा होना चाहिए जो समय और मौजूदा हालातों के अनुसार बदलता रहे। बेंच ने केंद्र से कहा कि ऐसे मामलों में गर्भपात के लिए तय टाइम लिमिट से जुड़े कानूनों में बदलाव करने की जरूरत है।

 

पीड़िता के अधिकार को सर्वोपरि माना

अदालत ने नाबालिग पीड़िता की पीड़ा को समझते हुए कड़ी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा:

  • नाबालिग को जबरन मां बनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

  • ऐसे संवेदनशील मामलों में अंतिम फैसला पीड़ित का ही होना चाहिए।

 

कानून बनाम मानवीय गरिमा

यह मामला भारत के मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) एक्ट और मानवीय गरिमा के बीच की बहस को फिर से सामने ले आया है। वर्तमान में 24 हफ्ते के बाद गर्भपात के लिए अदालती आदेश की आवश्यकता होती है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस रुख ने साफ कर दिया है कि गंभीर परिस्थितियों और रेप जैसे मामलों में पीड़िता के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को कानूनी सीमाओं पर तरजीह दी जाएगी।

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