शहीद देशराज के चाचा दशरथ सिंह ने बताया कि 25 अप्रैल को देशराज अपने 12 साथियों के साथ बॉर्डर पर गश्त कर रहे थे।
लैंडस्लाइड की चपेट में: दोपहर करीब 2 बजे जब टीम गश्त पर थी, तब देशराज समेत तीन जवान पीछे रह गए थे। इसी दौरान अचानक हुए भूस्खलन में तीनों जवान दब गए।
शहादत: इस दर्दनाक हादसे में देशराज सिंह और उनके एक अन्य साथी ने देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी, जबकि एक जवान घायल हो गया।
देशराज सिंह 28 अप्रैल को छुट्टी लेकर अपने गांव आने वाले थे। परिजनों को उनके आने का बेसब्री से इंतजार था।
आखिरी बातचीत: शहीद ने 22 अप्रैल को अपनी पत्नी तमन्ना से फोन पर बात की थी और अपनी 2 साल की मासूम बेटी के बारे में पूछा था। उन्हें क्या पता था कि यह उनकी आखिरी बातचीत होगी।
दोहरी त्रासदी: जिस दिन उन्हें अपनी बेटी और पत्नी के पास पहुंचना था, उसी दिन (मंगलवार) उनकी पार्थिव देह गांव पहुंची।
मंगलवार सुबह जब शहीद की पार्थिव देह पाटन थाने पहुंची, तो जनसैलाब उमड़ पड़ा।
पुष्पवर्षा: थाने से पैतृक गांव काचरेड़ा तक 6 किलोमीटर लंबी तिरंगा यात्रा निकाली गई। रास्ते भर 'शहीद देशराज सिंह अमर रहें' के नारे गूंजते रहे और लोगों ने छतों से फूलों की बारिश की।
परिजनों का बुरा हाल: गांव पहुंचने पर वीरांगना तमन्ना देवी और माता-पिता का रो-रोकर बुरा हाल था। शहीद की 2 साल की मासूम बेटी को देख हर किसी की आंखें नम हो गईं।
दोपहर 12 बजे पैतृक गांव के श्मशान घाट में शहीद का अंतिम संस्कार किया गया।
पिता को सौंपा तिरंगा: सेना के जवानों ने शहीद के पिता उदय सिंह को वह तिरंगा सौंपा जिसमें उनके बेटे का पार्थिव शरीर लिपटा हुआ था। जवानों ने हवा में गोलियां दागकर शहीद को सलामी दी।
मुख़ाग्नि: चाचा के बेटे रवि सिंह ने शहीद को मुखाग्नि दी। शहीद के बड़े भाई भोजराज सिंह, जो खुद जम्मू-कश्मीर में सेना में सिपाही हैं, उन्हें ही सबसे पहले इस घटना की सूचना मिली थी।
देशराज सिंह तंवर की शादी साल 2023 में हुई थी। वे अपने पीछे पत्नी, एक छोटी बेटी और माता-पिता को छोड़ गए हैं। गांव के युवाओं का कहना है कि देशराज हमेशा ऊर्जा से भरे रहते थे और उनकी शहादत पर पूरे गांव को गर्व है।