सवाई माधोपुर: बुधवार सुबह रणथंभौर के जंगलों में उस समय सन्नाटा खिंच गया, जब त्रिनेत्र गणेश मंदिर की तरफ बढ़ रहे श्रद्धालुओं के परिक्रमा मार्ग पर अचानक रणथंभौर का विख्यात टाइगर टी-20 (गणेश) आकर बैठ गया। बाघ की मौजूदगी की खबर मिलते ही वन विभाग की टीम ने मुस्तैदी दिखाते हुए रास्ते को ब्लॉक कर दिया और श्रद्धालुओं को सुरक्षित दूरी पर रोक दिया।
झाड़ियों में टाइगर को देख थम गए श्रद्धालुओं के कदम
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, हर महीने की चौथ पर जोगी महल के मुख्य गेट से लेकर पहाड़ी पर स्थित ऐतिहासिक त्रिनेत्र गणेश मंदिर तक विशेष चौथ परिक्रमा निकाली जाती है।
जंगल के बीच से रास्ता: लगभग 2 किलोमीटर लंबा यह परिक्रमा मार्ग रणथंभौर के घने कोर एरिया (जोन नंबर-3) के बीच से होकर गुजरता है।
अचानक दिखा 'गणेश': बुधवार सुबह करीब 9 बजे जैसे ही श्रद्धालु जोगी महल गेट से आगे बढ़े, उन्हें महज 100 मीटर की दूरी पर झाड़ियों के पास टाइगर टी-20 (गणेश) टहलता हुआ नजर आया। वन्यजीव को इतने करीब देख श्रद्धालुओं के कदम जहां के तहां थम गए।
डर भूलकर वीडियो बनाने लगे लोग, विभाग ने संभाला मोर्चा
रास्ते के इतने नजदीक बाघ को देखकर शुरुआत में कुछ समय के लिए अफरा-तफरी का माहौल बना, लेकिन जल्द ही श्रद्धालुओं की भीड़ जमा हो गई। लोग डर को भूलकर अपने मोबाइल कैमरों से बाघ के दीदार की तस्वीरें और वीडियो बनाने लगे।
अलर्ट मोड पर टीम: सूचना मिलते ही वन विभाग के रेंजर्स और ट्रैकर्स की टीम तुरंत मौके पर पहुंची। बाघ परिक्रमा मार्ग पर श्रद्धालुओं की तरफ न आ जाए, इसके लिए रास्ते पर सुरक्षा घेरा (मानव दीवार) बनाया गया और श्रद्धालुओं को एक ही स्थान पर रोक दिया गया।
डेढ़ घंटे तक झाड़ियों में रहा मूवमेंट, जाने के बाद खुला रास्ता
वन अधिकारियों के मुताबिक, टाइगर टी-20 करीब डेढ़ घंटे तक परिक्रमा मार्ग के आस-पास ही झाड़ियों में आराम से टहलता रहा। जब तक बाघ का मूवमेंट वहां बना रहा, वन विभाग ने किसी भी श्रद्धालु को आगे बढ़ने की इजाजत नहीं दी। करीब डेढ़ घंटे बाद जब बाघ खुद ही घने जंगल की ओर लौट गया, तब जाकर वन विभाग ने राहत की सांस ली और परिक्रमा मार्ग को दोबारा खोला गया।
सामान्य दिनों में बंद रहता है यह मार्ग
वन विभाग ने बताया कि सुरक्षा और वन्यजीवों की शांति के मद्देनजर सामान्य दिनों में जोगी महल गेट से निकलने वाले इस परिक्रमा मार्ग को आम जनता और श्रद्धालुओं के लिए पूरी तरह बंद रखा जाता है। लेकिन स्थानीय आस्था और परंपरा का सम्मान करते हुए केवल हर महीने की 'चौथ' के दिन ही इस विशेष रास्ते को खोला जाता है। विभाग ने श्रद्धालुओं से अपील की है कि जंगल के रास्ते में चलते समय वन्यजीवों को देखकर शोर न मचाएं और वनकर्मियों के निर्देशों का सख्ती से पालन करें।