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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: पैरोल के बावजूद कैदी को 24 दिन अतिरिक्त जेल में रखने पर 11 लाख मुआवजे के आदेश

जयपुर: सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के एक मामले में प्रशासनिक लापरवाही को 'अवैध हिरासत' (इलीगल डिटेंशन) मानते हुए पीड़ित को 11 लाख रुपए का मुआवजा देने का बड़ा आदेश जारी किया है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस अगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने 'दाऊदयाल बनाम राजस्थान सरकार' के मामले में यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि जब हाईकोर्ट ने कैदी को पैरोल पर रिहा करने का आदेश दे दिया था, तो कागजी औपचारिकताएं पूरी होने के बाद भी उसे 24 दिन तक जेल में बंद रखना पूरी तरह गैर-कानूनी था।

 

"दोषी होने से मानवाधिकार कम नहीं हो जाते"

अदालत ने जेल प्रशासन और सरकारी लेटलतीफी पर कड़ा रुख अपनाते हुए कुछ बेहद महत्वपूर्ण बातें कहीं:

  • व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन: पीठ ने स्पष्ट किया कि कोई व्यक्ति कानूनन दोषी सिद्ध हो चुका है, महज इस आधार पर उसके बुनियादी मानवाधिकार कम या खत्म नहीं हो जाते। प्रशासनिक देरी के बहाने किसी भी नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन नहीं किया जा सकता।

  • सरकार की दलील खारिज: राज्य सरकार ने दलील दी थी कि वे हाईकोर्ट के आदेश को ऊपरी अदालत में चुनौती देने पर विचार कर रहे थे, इसलिए रिहाई में देरी हुई। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब तक किसी ऊपरी अदालत से आदेश पर 'स्टे' (रोक) नहीं मिल जाता, तब तक अदालत के आदेश का तत्काल पालन करना अनिवार्य है।

 

क्या है पूरा मामला? 1988 के एक केस से जुड़ी है कहानी

यह पूरा मामला अपीलकर्ता दाऊदयाल से जुड़ा हुआ है, जिन्हें अलवर की एक अदालत ने साल 1988 के गैर-इरादतन हत्या के एक मामले में 4 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।

  • जेल यात्रा की शुरुआत: ऊपरी अदालत से भी अपील खारिज होने के बाद दाऊदयाल को 23 दिसंबर 2021 को गिरफ्तार किया गया था, तब से वह जेल में सजा काट रहे थे।

  • पैरोल के लिए संघर्ष: उन्होंने 3 दिसंबर 2023 को स्थायी पैरोल के लिए आवेदन किया, जिसे प्रशासन ने 18 जनवरी 2024 को खारिज कर दिया। इसके बाद दाऊदयाल ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी।

 

हाईकोर्ट के आदेश और कागजी औपचारिकता के बाद भी नहीं किया रिहा

दाऊदयाल की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने 5 नवंबर 2024 को उन्हें 1 लाख रुपए के निजी मुचलके और 50 हजार रुपए की दो जमानतें पेश करने पर रिहा करने का आदेश जारी किया था।

  • सजा का गणित: हाईकोर्ट के आदेश तक दाऊदयाल अपनी 4 साल की कुल सजा में से 3 साल, 2 महीने और 20 दिन जेल में बिता चुके थे और उनकी केवल 9 महीने 10 दिन की सजा बाकी थी।

  • कागजी कार्रवाई पूरी, फिर भी कैद: हाईकोर्ट के आदेश के बाद 13 नवंबर 2024 को जमानतदारों के दस्तावेजों का वेरिफिकेशन (सत्यापन) और सभी जरूरी कानूनी औपचारिकताएं पूरी हो चुकी थीं। इसके बावजूद जेल प्रशासन ने उन्हें रिहा नहीं किया। आखिरकार पीड़ित पक्ष को डिवीजन बेंच (खंडपीठ) का दरवाजा खटखटाना पड़ा, जिसके आदेश के बाद 6 दिसंबर 2024 को उन्हें रिहा किया गया। इस प्रकार वे पूरे 24 दिन तक अवैध रूप से जेल में बंद रहे।

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