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बोर्ड एग्जाम सीजन में बढ़ता ‘एकेडमिक स्ट्रेस’: कब नॉर्मल और कब खतरनाक?

बोर्ड एग्जाम सीजन में बढ़ता ‘एकेडमिक स्ट्रेस’: कब नॉर्मल और कब खतरनाक?

बोर्ड परीक्षाओं के साथ ही घरों में सिलेबस, टेस्ट सीरीज और रिजल्ट का दबाव बढ़ जाता है। हल्का तनाव सामान्य है, लेकिन जब यह लंबे समय तक दिमाग और शरीर पर असर डालने लगे तो गंभीर हो सकता है।

हालिया रिसर्च जर्नल The Lancet Child & Adolescent Health में प्रकाशित स्टडी के अनुसार, 15 साल की उम्र में ज्यादा पढ़ाई का दबाव आगे चलकर डिप्रेशन और सेल्फ-हार्म के जोखिम को बढ़ा सकता है।

एक्सपर्ट: डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर, जयपुर


🔎 एकेडमिक स्ट्रेस क्या है?

एकेडमिक स्ट्रेस वह मानसिक दबाव है, जो पढ़ाई से जुड़ी अपेक्षाओं और चुनौतियों के कारण महसूस होता है। जैसे:

  • ज्यादा सिलेबस

  • लगातार परीक्षाएं

  • क्लास में प्रतियोगिता

  • अच्छे नंबर लाने का दबाव

  • माता-पिता/शिक्षकों की अपेक्षाएं

लक्षण:

  • एंग्जाइटी और तनाव

  • चिड़चिड़ापन

  • एकाग्रता में कमी

  • सिरदर्द, नींद की समस्या

जब यह दबाव लंबे समय तक बना रहे और रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित करे, तो इसे गंभीर एकेडमिक स्ट्रेस माना जाता है।


📊 रिसर्च क्या कहती है?

करीब 5,000 बच्चों पर हुई स्टडी में पाया गया कि:

  • 15 साल की उम्र में ज्यादा स्कूल/एग्जाम प्रेशर होने पर

    • 16 साल तक डिप्रेशन का जोखिम 25% बढ़ सकता है

    • सेल्फ-हार्म का खतरा 8% बढ़ सकता है

  • 24 साल तक सुसाइड अटेम्प्ट का जोखिम 16% अधिक पाया गया

यह असर युवावस्था (20-30 वर्ष) तक बना रह सकता है।


❓ एकेडमिक स्ट्रेस क्यों होता है?

  • अत्यधिक अपेक्षाएं

  • तुलना और प्रतियोगिता

  • समय प्रबंधन की कमी

  • सोशल मीडिया/डिजिटल डिस्ट्रैक्शन

  • नींद और फिजिकल एक्टिविटी की कमी