Politics

राष्ट्र सुरक्षा और सैनिक सम्मान: क्या कुछ अधिकारी प्रधानमंत्री जी की मंशा के विरुद्ध सेना का मनोबल गिरा रहे हैं?

​वित्त विधेयक 2026 के खंड 108 के तहत विकलांगता पेंशन पर टैक्स लगाने का प्रस्ताव न केवल सैनिकों के साथ एक बड़ा अन्याय है, बल्कि यह उस राष्ट्रवादी विचारधारा के भी ठीक विपरीत है जो वर्तमान सरकार का मूल मंत्र रही है। जब हम इस प्रस्ताव का गहराई से विश्लेषण करते हैं, तो यह महज एक कर-सुधार नहीं, बल्कि सैनिकों के त्याग और बलिदान पर किया गया एक गहरा प्रहार प्रतीत होता है।

इस मुद्दे की गंभीरता को समझने के लिए हमें इतिहास के पन्नों को देखना होगा। यह छूट कोई नई मांग या दया की भीख नहीं है। विकलांगता पेंशन पर आयकर छूट 1922 से चली आ रही एक स्थापित व्यवस्था है। तत्कालीन ब्रिटिश सरकार और बाद में स्वतंत्र भारत की सरकारों ने यह स्वीकार किया था कि सैन्य सेवा में "असाधारण जोखिम" शामिल हैं। हमारे सैनिक सियाचिन की माइनस तापमान वाली बर्फीली चोटियों से लेकर राजस्थान के तपते रेगिस्थानों तक, अपनी जान की बाजी लगाकर देश की रक्षा करते हैं। इसलिए, 'विकलांगता पेंशन' को कभी भी 'आय' की श्रेणी में नहीं रखा गया, बल्कि इसे शरीर को हुए नुकसान और नागरिक जीवन में आजीविका की क्षमता कम होने के बदले दिए गए 'मुआवजे' के रूप में देखा गया। दशकों तक राष्ट्र का यह मानना रहा कि जो शरीर देश के लिए टूटा है, उस पर टैक्स लगाना अनैतिक है।

इस नए प्रस्ताव में छिपे अन्याय को समझने के लिए हमें युद्ध के मैदान या सीमा पर तैनात दो सैनिकों की तुलना करनी होगी: कल्पना कीजिए कि लद्दाख की दुर्गम चोटियों पर दो जवान तैनात हैं और दोनों को दुश्मन की गोलाबारी या विषम परिस्थितियों के कारण गंभीर चोटें आती हैं। ​सैनिक 'क': अपनी गंभीर चोटों के कारण सेवा जारी रखने में असमर्थ हो जाता है और उसे मेडिकल बोर्ड द्वारा 'चिकित्सकीय आधार पर सेवामुक्त' करके ससम्मान घर भेज दिया जाता है।

सैनिक 'ख': अदम्य साहस का परिचय देता है। वह हार नहीं मानता। वह अपनी विकलांगता के बावजूद, कृत्रिम अंग, बैसाखी या दवाइयों के सहारे सेवा जारी रखने का निर्णय लेता है और अपनी शारीरिक सीमाओं को चुनौती देते हुए अपनी 'पूर्ण सेवा अवधि' पूरी करके रिटायर होता है। पुराने नियमों के अनुसार दोनों का सम्मान बराबर था। लेकिन नए प्रस्ताव के अनुसार, सैनिक 'क' की पेंशन टैक्स-मुक्त रहेगी, जबकि सैनिक 'ख' को उसी चोट और उसी दर्द के लिए टैक्स देना होगा। यह संविधान के अनुच्छेद 14 यानी 'समानता के अधिकार' का सीधा उल्लंघन है। पचास प्रतिशत विकलांगता का दर्द और शारीरिक क्षति एक समान है, चाहे सैनिक 35 की उम्र में घर जाए या 55 की उम्र में। यह प्रस्ताव परोक्ष रूप से उस सैनिक को दंडित कर रहा है जिसने हार नहीं मानी और अंत तक डटा रहा। क्या हम अपनी सेना को यह संदेश देना चाहते हैं कि यदि आप जल्दी छोड़ दें तो फायदा है, और यदि डटे रहें तो सजा मिलेगी?

कानून में 'मानित परिकल्पना' का एक स्थापित सिद्धांत है। यह सिद्धांत मानता है कि अगर कोई सैनिक 'निम्न चिकित्सा श्रेणी' में रहते हुए रिटायर होता है, तो उसे भी चिकित्सकीय कारणों से सेवामुक्त हुए सैनिक के समान ही माना जाना चाहिए, क्योंकि उसकी विकलांगता सैन्य सेवा के कारण ही हुई है। वर्ष 2019 में भी नौकरशाही ने एक परिपत्र के जरिए इस अधिकार को छीनने की कोशिश की थी। तब पूर्व सैनिक समुदाय के विरोध के बाद माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने हस्तक्षेप किया था और सरकार को 'यथास्थिति' बनाए रखने का आदेश दिया था। अब, 2026 के बजट में उसी प्रयास को फिर से, एक नए रास्ते से लाया जा रहा है, जो सुप्रीम कोर्ट के आदेश की मूल भावना और न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।

लेकिन इस पूरे प्रकरण में एक बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है। यह सर्वविदित तथ्य है कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने पिछले एक दशक में राष्ट्र सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। चाहे वह सीमाओं पर अभूतपूर्व बुनियादी ढांचा मजबूत करना हो, सेना को आधुनिक हथियार मुहैया कराना हो, या फिर दशकों से लटके 'वन रैंक, वन पेंशन' को लागू करने के गंभीर और ईमानदार प्रयास हों—मोदी सरकार ने हमेशा सैनिकों के हितों को ऊपर रखा है। स्वयं प्रधानमंत्री जी हर दीपावली और त्योहार अपने परिवार के साथ नहीं, बल्कि सीमाओं पर तैनात हमारे जवानों के बीच मनाते हैं। उनका यह अपनापन सैनिकों में एक नई ऊर्जा और विश्वास भरता है।

ऐसे में, यह विकलांगता पेंशन पर टैक्स लगाने का प्रस्ताव प्रधानमंत्री जी की सोच, उनकी कार्यशैली और सैनिकों के प्रति उनके प्रेम से बिल्कुल भी मेल नहीं खाता। यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि यह भारी त्रुटि उन कुछ अधिकारियों या नौकरशाहों की उपज है जो वातानुकूलित कमरों में बैठकर नियम बनाते हैं और जमीनी हकीकत से पूरी तरह कटे हुए हैं। ऐसा लगता है कि प्रशासन में बैठे कुछ तत्व, जानबूझकर या अज्ञानता में, सैनिकों के बीच 'नकारात्मकता' और असंतोष फैलाकर देश को आंतरिक रूप से कमजोर करना चाहते हैं। एक सैनिक और राष्ट्र का मनोबल गिराने की ऐसी कार्रवाई को किसी भी स्तर पर 'राष्ट्र हित' में नहीं कहा जा सकता, इसे 'राष्ट्र विरोधी' मानसिकता का परिचायक ही माना जा सकता है। यह पूर्णतः संभव है कि इन अधिकारियों ने प्रधानमंत्री जी को इस निर्णय के दूरगामी दुष्प्रभावों और सैनिकों की आहत भावनाओं से ठीक से अवगत नहीं कराया है।
​निष्कर्ष: राष्ट्र की अंतरात्मा और शौर्य की कीमत
​अंत में, यह मुद्दा केवल अर्थशास्त्र का नहीं, बल्कि राष्ट्र की अंतरात्मा का है। एक सैनिक की विकलांगता की कोई 'समय सीमा' नहीं होती। जब एक सैनिक अपनी वर्दी खूंटी पर टांगता है, तो उसके शरीर का दर्द रिटायर नहीं होता; वह दर्द उसके साथ अंतिम सांस तक चलता है। उस दर्द के मुआवजे को 'कर योग्य आय' मानना सैनिक के पवित्र बलिदान को एक तुच्छ वित्तीय लेन-देन में बदलने जैसा है।
  ​हमें और पूरे पूर्व सैनिक समुदाय को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी पर पूर्ण और अटूट भरोसा है। हमें विश्वास है कि जैसे ही यह विसंगति और इसके पीछे का कड़वा सच उनके संज्ञान में आएगा, वे इसे तुरंत प्रभाव से ठीक करेंगे। हमारे पूर्व सैनिकों की बैसाखियों और कटे अंगों के मुआवजे पर टैक्स लगाकर प्राप्त होने वाला राजस्व, हमारे राष्ट्र के गौरव के सामने बहुत मामूली है। क्या हम अपने बजट को संतुलित करने के लिए अपने नायकों के दर्द का सौदा करेंगे? नहीं, भारत ऐसा कभी नहीं कर सकता।
​हम सरकार से यह विनम्र लेकिन दृढ़ आग्रह करते हैं कि केवल इस फैसले को वापस लेना ही काफी नहीं होगा। हमें भविष्य के लिए एक ठोस 'संरक्षण नीति' और सुरक्षा कवच चाहिए। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि भविष्य में कोई भी अधिकारी या विभाग सैनिकों से जुड़ी किसी भी सुविधा या कल्याणकारी योजना को वापस लेने, उसे कम करने या उसे कमजोर करने का दुस्साहस न कर सके। सैनिकों के कल्याण से जुड़े मुद्दों पर नौकरशाही की मनमानी पर पूर्ण विराम लगना चाहिए।
​राष्ट्र की सुरक्षा केवल सीमाओं पर तैनात तोपों और मिसाइलों से नहीं, बल्कि वर्दी पहनने वाले सैनिक के उच्च मनोबल से होती है। हमें पूर्ण विश्वास है कि मोदी सरकार सेना के इस मनोबल को टूटने नहीं देगी और यह सुनिश्चित करेगी कि 'शौर्य की कीमत' पर कभी कोई टैक्स न लगाया जाए।