World

पश्चिम एशिया संघर्ष, प्रॉक्सी आतंक नेटवर्क और भारत की रणनीतिक चुनौती: ऊर्जा सुरक्षा, क्षेत्रीय स्थिरता और आत्मनिर्भरता की अनिवार्यता ..... ​कर्नल देव आनंद लोहा मरोड़ (अन्तर्राष्ट्रीय विषय विशेषज्ञ)

​पश्चिम एशिया में ईरान केंद्रित चल रहा संघर्ष केवल एक पारंपरिक भू-राजनीतिक टकराव नहीं है, बल्कि यह एक जटिल और बहु-स्तरीय संकट है, जिसमें ऊर्जा असुरक्षा, आपूर्ति शृंखलाओं में व्यवधान और राज्य-प्रायोजित परोक्ष युद्ध का स्थायी खतरा शामिल है। भारत के लिए इसके प्रभाव केवल तेल की कीमतों में वृद्धि या व्यापारिक बाधाओं तक सीमित नहीं हैं। यह युद्ध एक गहरे और अधिक खतरनाक आयाम को उजागर करता है—ईरान समर्थित इतर-राज्यीय अभिकर्ताओं (Non-state actors) का विस्तार और एक संभावित परमाणु-सक्षम ईरान से उत्पन्न रणनीतिक जोखिम। ये दोनों तत्व मिलकर इस संकट को एक आर्थिक समस्या से आगे बढ़ाकर एक दीर्घकालिक सुरक्षा चुनौती बना देते हैं।
​इस संकट का आर्थिक केंद्र है Strait of Hormuz, जिसके माध्यम से प्रतिदिन लगभग 21 मिलियन बैरल तेल—जो वैश्विक खपत का लगभग 20 प्रतिशत है—गुजरता है। भारत, जो अपने कुल कच्चे तेल का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है और जिसमें से 60 प्रतिशत से अधिक खाड़ी देशों से आता है, इस मार्ग पर अत्यधिक निर्भर है। यदि इस मार्ग में 20–30 प्रतिशत तक भी बाधा आती है, तो वैश्विक आपूर्ति से 6 से 7 मिलियन बैरल प्रतिदिन की कमी हो सकती है, जिससे तेल की कीमतें $70–80 प्रति बैरल से बढ़कर $110–120 या उससे अधिक हो सकती हैं। भारत के लिए इसका सीधा अर्थ है कि हर $10 की वृद्धि पर लगभग $15 बिलियन का अतिरिक्त वार्षिक बोझ पड़ता है, जो सीधा मुद्रास्फीति (Inflation), रुपये पर दबाव और आर्थिक विकास में गिरावट का कारण बनता है।
​हालांकि, इस संकट को केवल आर्थिक दृष्टिकोण से देखना एक बड़ी भूल होगी। ईरान का यह संघर्ष उसके व्यापक परोक्ष (Proxy) नेटवर्क से गहराई से जुड़ा हुआ है, जिसमें Hamas, Hezbollah, और Houthi movement जैसे संगठन शामिल हैं, साथ ही इराक और सीरिया में सक्रिय विभिन्न शिया मिलिशिया भी इसका हिस्सा हैं। ये संगठन केवल वैचारिक सहयोगी नहीं हैं, बल्कि ईरान की रणनीतिक शक्ति का विस्तार हैं, जिनके माध्यम से वह बिना प्रत्यक्ष युद्ध के अपने प्रभाव का विस्तार करता है।

​इन परोक्ष समूहों की उपस्थिति इस युद्ध की प्रकृति को पूरी तरह बदल देती है। यदि युद्ध के अंत तक इन नेटवर्कों को समाप्त या कमजोर नहीं किया गया, तो ईरान एक और अधिक मजबूत असममित शक्ति के रूप में उभर सकता है। इसका अर्थ होगा कि वह प्रत्यक्ष युद्ध से बचते हुए अप्रत्यक्ष संघर्षों के माध्यम से क्षेत्र में अस्थिरता बनाए रख सकता है। इतना ही नहीं, वह नए परोक्ष संगठनों का निर्माण भी कर सकता है, जिससे भविष्य में और अधिक क्षेत्रों में तनाव पैदा कर वैश्विक व्यवस्था को प्रभावित किया जा सके।

​यह स्थिति वैश्विक सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती प्रस्तुत करती है। परोक्ष युद्ध ईरान को एक ऐसा उपकरण प्रदान करता है, जिसके माध्यम से वह समुद्री मार्गों को बाधित कर सकता है, ऊर्जा अवसंरचना को निशाना बना सकता है और स्थानीय संघर्षों के जरिए वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। हाल के वर्षों में लाल सागर क्षेत्र में जहाजों पर हमले और मिसाइल हमलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह रणनीति कितनी प्रभावी और खतरनाक हो सकती है। भारत जैसे देश, जो अपनी ऊर्जा और व्यापार के लिए समुद्री मार्गों पर निर्भर हैं, के लिए यह एक दीर्घकालिक खतरा है। इस संकट का दूसरा और अधिक चिंताजनक पहलू है—ईरान की परमाणु क्षमता। वर्तमान संघर्ष में ईरान ने जिस प्रकार से विभिन्न क्षेत्रों में मिसाइल और ड्रोन हमलों का उपयोग किया है, वह उसकी बढ़ती सैन्य क्षमता और आक्रामक रणनीति को दर्शाता है। यदि ऐसा देश परमाणु हथियारों से लैस हो जाता है, तो यह वैश्विक संतुलन के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। पारंपरिक परमाणु प्रतिरोध सिद्धांत यह मानता है कि राष्ट्र तर्कसंगत तरीके से व्यवहार करेंगे, लेकिन जब एक परमाणु शक्ति परोक्ष युद्ध के साथ जुड़ जाती है, तो यह संतुलन अस्थिर हो सकता है।

एक परमाणु-सक्षम ईरान, जो परोक्ष संगठनों का उपयोग करता हो, एक नई प्रकार की चुनौती प्रस्तुत करेगा। वह परमाणु शक्ति को एक 'रणनीतिक ढाल' के रूप में इस्तेमाल करते हुए अपने परोक्ष नेटवर्क के माध्यम से संघर्षों को बढ़ावा दे सकता है। इससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए प्रतिक्रिया देना और अधिक कठिन हो जाएगा, क्योंकि किसी भी प्रत्यक्ष कार्रवाई में बड़े पैमाने पर युद्ध का खतरा होगा। यह स्थिति वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था को अस्थिर कर सकती है और ईरान को अधिक आक्रामक नीतियां अपनाने के लिए प्रेरित कर सकती है।

​भारत के लिए यह दोहरी चुनौती—आर्थिक और सुरक्षा—एक व्यापक और संतुलित रणनीति की मांग करती है। ऊर्जा क्षेत्र में विविधीकरण अत्यंत आवश्यक है। रूस, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और अमेरिका जैसे विकल्पों की ओर निरंतर बढ़ना होगा ताकि खाड़ी क्षेत्र पर निर्भरता कम की जा सके। साथ ही, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) को बढ़ाना भी जरूरी है। वर्तमान में भारत का रणनीतिक भंडार लगभग 9.5 दिनों की जरूरतों के लिए है, जिसे तेल कंपनियों के स्टॉक के साथ मिलाकर भविष्य में 90 दिनों के अंतरराष्ट्रीय मानक तक ले जाने का लक्ष्य रखना होगा।
​इसके साथ ही वैकल्पिक व्यापार मार्गों का विकास भी महत्वपूर्ण है। अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC), चेन्नई-व्लादिवोस्तोक मार्ग और IMEC (भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा) जैसे विकल्प भारत को जोखिमपूर्ण समुद्री मार्गों से बचा सकते हैं।

नवीकरणीय ऊर्जा, विद्युत वाहनों और घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना भी दीर्घकालिक समाधान का हिस्सा होना चाहिए। सुरक्षा के स्तर पर भारत को अधिक सक्रिय भूमिका निभानी होगी। समुद्री सुरक्षा को मजबूत करना, खुफिया सहयोग बढ़ाना और महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक है। साथ ही, भारत को अपनी कूटनीतिक रणनीति में संतुलन बनाए रखते हुए स्पष्ट रूप से यह संदेश देना होगा कि परोक्ष आतंकवाद और परमाणु अस्थिरता वैश्विक शांति के लिए अस्वीकार्य हैं।
​निष्कर्षतः, पश्चिम एशिया का यह संघर्ष केवल ऊर्जा संकट या क्षेत्रीय टकराव नहीं है, बल्कि यह एक बहुआयामी चुनौती है जिसमें आर्थिक दबाव, परोक्ष आतंकवाद और परमाणु खतरे शामिल हैं। भारत को इस स्थिति का सामना एक समग्र रणनीति के साथ करना होगा, जिसमें ऊर्जा सुरक्षा, आपूर्ति शृंखला की मजबूती और राष्ट्रीय सुरक्षा को एक साथ जोड़ा जाए। आज लिया गया निर्णय ही तय करेगा कि भारत भविष्य में इन चुनौतियों का सामना करने में कितना सक्षम और आत्मनिर्भर बनता है।

Similer Posts