रेलवे प्रशासन ने इस मामले में 16 जून को वरिष्ठ मंडल अभियंता (दक्षिण) की ओर से सहायक मंडल अभियंता (रामगंजमंडी) को पत्र जारी कर आवश्यक कानूनी कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही कोटा विकास प्राधिकरण (KDA) को भी पत्र लिखकर मामले में आवश्यक कदम उठाने और लीज की शर्तों के अनुरूप कार्रवाई सुनिश्चित करने को कहा गया है।
रेलवे के अनुसार, संबंधित भूमि 10 जुलाई 2008 को तत्कालीन नगर विकास न्यास (यूआईटी), जिसे अब कोटा विकास प्राधिकरण (KDA) कहा जाता है, को 35 वर्ष की लीज पर दी गई थी। इस लीज का उद्देश्य केवल सार्वजनिक हित में सड़क निर्माण था। लीज की शर्तों में स्पष्ट उल्लेख किया गया था कि इस भूमि का व्यावसायिक, संस्थागत या किसी अन्य प्रकार के निर्माण कार्य के लिए उपयोग नहीं किया जा सकता।
रेलवे का आरोप है कि इन शर्तों की अनदेखी करते हुए वर्ष 2020 में तत्कालीन यूआईटी ने इसी भूमि का आवंटन भाजपा को जिला कार्यालय निर्माण के लिए कर दिया। रेलवे का कहना है कि यह निर्णय लीज की शर्तों के विपरीत है और इसलिए वर्तमान निर्माण को वैध नहीं माना जा सकता।
यह विवाद नया नहीं है। रेलवे के एसएसई (परमानेंट-वे साउथ) ने 7 अप्रैल को उच्च अधिकारियों को पत्र लिखकर रेल लाइन के किलोमीटर 910/10 से 914/00 के बीच रेलवे भूमि पर अवैध निर्माण होने की जानकारी दी थी। इसके बाद मामले की जांच के लिए 14 मई को रेलवे, KDA और राजस्व विभाग की संयुक्त टीम ने मौके पर सर्वे किया।
संयुक्त सर्वे के दौरान भूमि की वास्तविक सीमा को लेकर भी मतभेद सामने आए। राजस्व विभाग ने वर्ष 1982 के रिकॉर्ड के आधार पर संबंधित स्थान पर रेलवे भूमि की चौड़ाई 72 मीटर बताई, जबकि रेलवे ने वर्ष 1965 के संयुक्त भूमि मानचित्र (जॉइंट लैंड प्लान) का हवाला देते हुए दावा किया कि इस क्षेत्र में उसकी भूमि की चौड़ाई 182.88 मीटर दर्ज है।
इसी अंतर के कारण भूमि की वास्तविक स्थिति और स्वामित्व को लेकर विवाद और गहरा गया है।
सहायक मंडल अभियंता (रामगंजमंडी) पश्चिम मध्य रेलवे पुंडरिक चंद्र ने कहा कि रेलवे ने यह भूमि केवल सड़क निर्माण के लिए सार्वजनिक हित में लीज पर दी थी। ऐसे में किसी अन्य उद्देश्य से इसका उपयोग लीज की शर्तों का उल्लंघन है।
उन्होंने कहा कि KDA की कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी है कि वह भूमि का उपयोग उसी उद्देश्य के लिए सुनिश्चित करे, जिसके लिए उसे लीज पर दिया गया था। रेलवे ने इस संबंध में KDA को औपचारिक पत्र भेजकर आवश्यक कार्रवाई करने का आग्रह किया है।
विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए भाजपा शहर जिलाध्यक्ष राकेश जैन ने कहा कि भाजपा ने इस भूखंड के लिए निर्धारित राशि का पूरा भुगतान किया है और KDA ने सभी नियमों का पालन करते हुए विधिवत आवंटन किया है।
उन्होंने कहा कि यदि रेलवे को किसी प्रकार की आपत्ति है तो वह रेलवे और KDA के बीच का विषय है। भाजपा ने अधिकृत एजेंसी से भूमि प्राप्त की है और पार्टी का इससे आगे कोई संबंध नहीं है।
राकेश जैन ने यह भी कहा कि यदि रेलवे इस क्षेत्र को अपनी भूमि बता रहा है तो फिर पूरे इलाके में पहले से बने अन्य निर्माणों पर भी सवाल उठना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में बस स्टैंड सहित कई स्थायी निर्माण पहले से मौजूद हैं और केवल भाजपा कार्यालय को निशाना बनाना उचित नहीं है।
भाजपा जिला कार्यालय के लिए इस भूखंड का आवंटन पहले भी राजनीतिक और प्रशासनिक विवाद का विषय बन चुका है।
वर्ष 2016 में तत्कालीन भाजपा सरकार के दौरान यूआईटी ने यह भूखंड भाजपा को आवंटित किया था। इसके लिए भाजपा ने 1 करोड़ 72 लाख 50 हजार रुपये जमा कराए थे। भुगतान के बाद रजिस्ट्री भी हुई और पार्टी को भूखंड का कब्जा सौंप दिया गया।
हालांकि वर्ष 2020 में कांग्रेस सरकार के कार्यकाल के दौरान इस आवंटन को निरस्त कर दिया गया। इसके बाद मामला लंबे समय तक विवाद में रहा।
मार्च 2025 में राज्य में भाजपा सरकार बनने के बाद यह मामला विधानसभा में उठा। इस दौरान नगरीय विकास एवं आवासन (यूडीएच) मंत्री ने भाजपा को भूखंड का आवंटन बहाल करने की घोषणा की। इसके बाद यूडीएच विभाग ने दोबारा आवंटन जारी कर दिया और कार्यालय निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ी।
रेलवे द्वारा आधिकारिक तौर पर आपत्ति दर्ज कराने और KDA को कार्रवाई के लिए पत्र भेजने के बाद अब यह मामला कानूनी और प्रशासनिक स्तर पर महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंच गया है। एक ओर रेलवे लीज की शर्तों का हवाला देते हुए निर्माण को अवैध बता रहा है, वहीं भाजपा का कहना है कि उसने वैधानिक प्रक्रिया के तहत KDA से भूमि प्राप्त की है और यदि कोई विवाद है तो उसका समाधान संबंधित सरकारी एजेंसियों के बीच होना चाहिए।
भूमि के स्वामित्व, लीज की वैधता और आवंटन प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों के बीच अब सबकी नजर KDA की आगामी कार्रवाई और संभावित कानूनी प्रक्रिया पर टिकी हुई है। यह विवाद न केवल भूमि उपयोग के नियमों बल्कि सरकारी संस्थाओं के अधिकार क्षेत्र और प्रशासनिक निर्णयों की वैधता पर भी महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े कर रहा है।